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'मानसिक परेशानी देने वाला मजाक अपराध'
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
Updated Wed, 17 Sep 2014 11:29 AM IST
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हंसी मजाक अगर किसी को मानसिक परेशानी देता है तो वह अपराध की श्रेणी में है। शरारत एक हद तक होती है, हद लांघने के बाद यह भी अपराध में आता है। यह बात एपीजी यूनिवर्सिटी शिमला में एंटी रैगिंग कार्यशाला में प्रदेश के रिटायर्ड जस्टिस वीके शर्मा ने कही।
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उन्होंने छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के साथ यूनिवर्सिटी प्रबंधन को एंटी रैगिंग नियमों से अवगत करवाया। उन्होंने कहा कि हंसी-मजाक एक हद तक और सीमा तक होना चाहिए। जब मजाक किसी को मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान करने लगे तो इसे रोका जाना संस्थान की जिम्मेदारी है।
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यह भी ध्यान रहे कि इससे किसी की भावनाएं आहत न हो। कभी-कभार ज्यादा हंसी मजाक दूसरों के लिए घातक हो जाता है। छात्र-छात्राएं रैगिंग के कारण मानसिक रूप से परेशान होकर और डर से गलत कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं।
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शिक्षण संस्थानों में आमतौर पर नए छात्रों के परिचय के नाम पर छात्रों को कुछ शरारती तत्व परेशान करने लगते हैं। उनके साथ शरारतें करते हैं, यह शरारत तक ही सीमित रहे तो ठीक आगे बढ़ने पर यह अपराध की श्रेणी में आता है। रैगिंग करने वाले के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है।
एपीजी शिमला यूनिवर्सिटी की डिपार्टमेंट ऑफ लॉ विभागाध्यक्ष तृशा शर्मा ने कहा कि रैगिंग वर्तमान समय का बड़ा मुद्दा है। सबसे पहले छात्र-छात्राओं को रैगिंग के मायने समझने होंगे। उन्होंने कहा कि रैगिंग का मतलब किसी के साथ बदसलूकी करना नहीं है।
उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग की शुरुआत जूनियर और सीनियर छात्र-छात्राओं में मेलजोल कायम करने के लिए की थी। लेकिन लोगों ने इसका गलत तरीके से इस्तेमाल किया। तीन दिन की इस कार्यशाला में यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. श्रीनिवास, रजिस्ट्रार राजन सहगल, एपीजी की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर प्रियंका गोयल सभी कई पदाधिकारियों ने भाग लिया।