मां गौरी के इस कुंड में गंगाजल से आता है उफान
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पवित्र मणिमहेश यात्रा के दौरान सुंदरासी से अगला पड़ाव गौरी कुंड है। इसकी सुंदरासी से दूरी महज ढाई किलोमीटर के आसपास है। सुंदरासी से गौरी कुंड के लिए दो रास्ते हैं।
एक रास्ता भैरोघाटी से होते हुए व दूसरा रास्ता वह जो दो दशक पहले सुंदरासी से अलग बनाया गया है। श्रद्धालु इन दो रास्तों से गौरी कुंड तक पहुंचते हैं। सुंदरासी से गौरी कुंड की दूरी तय करने में खूब पसीना निकलता है।
जैसे ही श्रद्धालु गौरी कुंड पहुंचते हैं, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। यहां पर एक तरफ गौरी कुंड व दूसरी तरफ भगवान शंकर के कैलाश पर्वत के दर्शन होते हैं। उनके दर्शनों से श्रद्धालुओं की थकान छूमंतर हो जाती है।
गौरी कुंड की समुद्रतल से ऊंचाई करीब 11 हजार फीट है। यहां पर मां गौरी के चिन्ह व एक गौरी कुंड है, जहां पर केवल महिलाएं ही स्नान कर सकती हैं। पुरुषों के लिए यहां स्नान करना वर्जित है।
गंगाजल गिरा तो सूख जाएगा पानी
गौरी कुंड से आगे के लिए दो रास्ते हैं। यह रास्ते इसलिए बनाए हैं कि कई श्रद्धालु अपने साथ गंगाजल को डल झील पर विराजमान चतुर्मुखी शिव लिंग पर चढ़ाने के लिए लाते हैं।
अगर गौरी कुंड पर गंगाजल को लाया जाए, तो कुंड में उफान आ जाता है। गलती से गंगाजल गौरी कुंड में गिर जाए, तो कुंड सूख जाता है।
इसके चलते यहां पर गंगाजल ले जाना वर्जित है। बताया जाता है कि कई सदियों पहले यहां पर गंगाजल लाने से कुंड सूख गया था। इसके बाद किसी तरह दोबार से गौरी कुंड में पानी आया था।
गौरी कुंड के बारे में मान्यता है कि मां पार्वती ने इस स्थान पर कठोर तप कर भगवान शंकर को पाया था। इस कुंड के साथ मां गौरा की कुंवारी कन्या पूजा करती है, तो मनवांछित फल प्राप्त होता है। सुहागिन मां गौरा को सुहागी का सामान चढ़ाती है।
यहां तेजस्वी करते हैं तप
उन्होंने कहा कि देवी-देवताओं को भी यह स्थान बड़ी मुश्किल से मिलता है। भगवान शंकर व मां पार्वती के उपासकों के लिए यह स्थान काफी महत्वपूर्ण है। अक्सर यहां पर साधु संत भगवान शंकर व पार्वती का ध्यान करते हैं। पवित्र आत्माओं को उनके दर्शन भी होते हैं।