राजनीति: किशाऊ बांध पर राजीव बिंदल का सीएम सुक्खू पर जुबानी हमला, तथ्य गलत ढंग से पेश करने का आरोप
डॉ. राजीव बिंदल ने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना का समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों से संभव हुआ है। भाजपा इस परियोजना और समझौते का स्वागत करती है, लेकिन मुख्यमंत्री को इसके वास्तविक वित्तीय प्रावधानों और हिमाचल प्रदेश के दीर्घकालिक हितों की स्थिति जनता के सामने स्पष्ट करनी चाहिए।
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भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने किशाऊ बांध परियोजना को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू पर तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत करने और परियोजना का श्रेय लेने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना का समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों से संभव हुआ है। भाजपा इस परियोजना और समझौते का स्वागत करती है, लेकिन मुख्यमंत्री को इसके वास्तविक वित्तीय प्रावधानों और हिमाचल प्रदेश के दीर्घकालिक हितों की स्थिति जनता के सामने स्पष्ट करनी चाहिए।
डॉ. बिंदल ने सोमवार को प्रेसवार्ता में कहा कि मुख्यमंत्री लगातार किशाऊ बांध परियोजना की उपलब्धियां गिना रहे हैं, लेकिन परियोजना के वास्तविक वित्तीय प्रावधानों और केंद्र सरकार के योगदान को सामने नहीं रख रहे हैं। बिंदल ने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना की कुल अनुमानित लागत 15,624 करोड़ है। इसमें जल घटक की लागत 12,096 करोड़ और विद्युत घटक की लागत 3,528 करोड़ निर्धारित की गई है। उन्होंने कहा कि जल घटक की 12,096 करोड़ की राशि केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाने की व्यवस्था इस परियोजना को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण आधार है। इस परियोजना की परिकल्पना ब्रिटिश काल में हुई थी। वर्ष 1944-45 में इसका प्रारंभिक सर्वेक्षण हुआ, वर्ष 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और वर्ष 1964 में प्राथमिक रिपोर्ट तैयार हुई।
इसके बावजूद यह परियोजना दशकों तक आगे नहीं बढ़ सकी। डॉ. बिंदल ने कहा कि वर्ष 2025 में केंद्र सरकार द्वारा जल घटक का खर्च वहन करने का सैद्धांतिक निर्णय परियोजना के लिए निर्णायक साबित हुआ। इसी के परिणामस्वरूप 15 सितंबर 2026 को छह राज्यों के बीच समझौता संभव हो पाया। डॉ. बिंदल ने कहा कि वर्ष 2015 में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बीच विद्युत घटक की लागत को 50-50 प्रतिशत के अनुपात में वहन करने की सहमति बनी थी। परियोजना के विद्युत घटक की कुल अनुमानित लागत 3,528 करोड़ है। इस व्यवस्था के अनुसार हिमाचल प्रदेश को 1,764 करोड़ का निवेश करना पड़ता। उन्होंने कहा कि परियोजना की निर्धारित पूर्णता अवधि वर्ष 2040 तक बताई जा रही है। यदि निवेश को 13 वर्षों में विभाजित किया जाए, तो हिमाचल पर औसतन 135.69 करोड़ प्रतिवर्ष का वित्तीय दायित्व बनता है।
डॉ. बिंदल ने कहा कि पूर्व निर्धारित जल बंटवारे के अनुसार हरियाणा की हिस्सेदारी 40.6, उत्तर प्रदेश की 30.1, दिल्ली की 10.4, राजस्थान की 6.3 और हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की हिस्सेदारी 1.7-1.7 प्रतिशत थी। उन्होंने दावा किया कि नए समझौते में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं। डॉ. बिंदल ने कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं किशाऊ बांध परियोजना से हिमाचल को लगभग 1,200 करोड़ प्रतिवर्ष की आय होने का दावा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री के इस अनुमान को आधार बनाया जाए और हिमाचल स्वयं विद्युत घटक में 1,764 करोड़ का निवेश करता, तो साधारण गणना के अनुसार लगभग डेढ़ वर्ष की आय इस निवेश के बराबर होती।
सिरमौर के किसानों के सिंचाई अधिकारों की अनदेखी का आरोप
डॉ. बिंदल ने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका संबंध सिरमौर जिले के किसानों, बागवानों और भविष्य की कृषि अर्थव्यवस्था से भी है। उन्होंने कहा कि टोंस नदी पर विशाल बांध बनने से जल स्तर में परिवर्तन होगा और इस जल संसाधन के माध्यम से सिरमौर के अनेक क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार की संभावनाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए था। डॉ. बिंदल ने आरोप लगाया कि किशाऊ परियोजना में हिमाचल के जल अधिकारों से संबंधित निर्णय लेते समय सिरमौर के किसानों की भविष्य की सिंचाई आवश्यकताओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी गई।
किशाऊ परियोजना पर कांग्रेस ने भाजपा को घेरा
वहीं प्रदेश कांग्रेस संगठन महामंत्री विनोद जिंटा ने किशाऊ जल विद्युत परियोजना को लेकर भाजपा पर निशाना साधा है। उन्होंने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राजीव बिंदल पर सिरमौर के किसानों और प्रभावित परिवारों को गुमराह करने का आरोप लगाया। जिंटा ने कहा कि यह परियोजना हिमाचल प्रदेश के लिए एक बड़ा आर्थिक अवसर है, जिससे प्रतिवर्ष लगभग 1200 करोड़ रुपये की आय होगी। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने समझौते में हिमाचल के हितों को प्राथमिकता दी है। सिरमौर के किसानों और प्रभावित परिवारों के हितों को सुरक्षित रखा गया है। उन्हें लागू भूमि अधिग्रहण नियमों के अनुसार उचित मुआवजा और पुनर्वास लाभ मिलेंगे। स्थानीय क्षेत्र विकास निधि से परियोजना प्रभावित क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाएगा। जिंटा ने कहा कि भाजपा हिमाचल को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से मजबूत बनते नहीं देखना चाहती। उन्होंने भाजपा से स्पष्ट करने को कहा कि वह इस समझौते के पक्ष में है या खिलाफ। भाजपा अपने कार्यकाल में इस परियोजना को अंतिम रूप नहीं दे सकी थी। अब जब प्रदेश सरकार ने इसे अंतिम रूप दिया है, तो भाजपा नेताओं को यह समझौता पसंद नहीं आ रहा है। परियोजना से हिमाचल प्रदेश को 211 मेगावाट बिजली का हिस्सा बिना उत्पादन लागत के मिलेगा। इसमें हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की समान भागीदारी तय की गई है। परियोजना के तहत 50 फीसदी रोजगार के अवसर हिमाचल प्रदेश के युवाओं के लिए उपलब्ध होंगे। हिमाचल को अपने जल संसाधनों से आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए कोई बड़ा वित्तीय बोझ नहीं उठाना पड़ेगा। इससे राज्य को दीर्घकालिक राजस्व मिलेगा।