ये 24 प्रोजेक्ट मचा देंगे तबाही, वैज्ञानिकों ने पीएम मोदी और चीफ जस्टिस को लिखा पत्र
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शीत मरुस्थल लाहौल-स्पीति में चिनाब की धारा पर प्रस्तावित 24 बिजली परियोजनाओं से पीर पंजाल के सैकड़ों साल पुराने ग्लेशियरों का वजूद खतरे में पड़ जाएगा। विशेषज्ञों का दावा है कि प्रोजेक्टों के लिए बनने वाली टनल के लिए होने वाली ब्लास्टिंग से पहाड़ खोखले हो जाएंगे।
ग्लेशियर हिले तो पिघलना शुरू हो जाएंगे। प्रोजेक्ट बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीनरी से पर्यावरण प्रदूषण होगा। परियोजनाओं के लिए लाखों पेड़ों की बलि ली जाएगी और इससे पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाएगा। सैकड़ों हेक्टेयर भूमि पानी में समा जाएगी। दुर्लभ वन्य प्राणी और वनस्पतियां यहां से गायब हो जाएंगी।
लाहौल घाटी में चिनाब नदी पर करीब दो दर्जन बिजली परियोजनाएं बनाने की योजना है। इन परियोजनाओं में भारत सरकार ने 50 हजार करोड़ निवेश कर करीब 5000 मेगावट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है। सेव लाहौल-स्पीति संस्था ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इन प्रस्तावित बिजली परियोजनाओं को तत्काल निरस्त करने की अपील की है।
वैज्ञानिक बोले- वजूद को खतरा
संस्था के सदस्य डॉ. पीडी लाल ने पत्र में अंदेशा जताया कि बिजली परियोजनाओं के निर्माण से घाटी का ईको सिस्टम गड़बड़ाएगा। घाटी के बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ जनजातीय समाज की दुर्लभ संस्कृति को भी क्षति पहुंचेगी।
संस्था के संयोजक रिगजिन हायरपा ने कहा कि लोगों के विरोध के चलते 300 मेगावाट की जिस्पा बांध परियोजना ठंडे बस्ते में चले गई है। यहां भी प्रोजेक्टों के विरोध और संघर्ष की लड़ाई जारी रहेगी।
वर्ष 2009 में हिमाचल के लाहौल-स्पीति क्षेत्र को जैव संपदा सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया है। यह क्षेत्र यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में भी शामिल है।
सेव संस्था ने केंद्र सरकार से लाहौल और पांगी के चिनाब बेसिन को ईको सेंसिटिव जोन घोषित कर इन परियोजनाओं को निरस्त करने की मांग उठाई है।
बेहद नाजुक इकोलॉजिकल सिस्टम वाले चिनाब बेसिन में एक साथ इतने मेगा प्रोजेक्ट बनने से निश्चित तौर पर ग्लेशियरों के वजूद को खतरा होगा। परियोजनाओं के निर्माण से प्रदूषण का स्तर बढ़ने से ग्लेशियर ही नहीं, घाटी की जैव विविधता पर भी प्रतिकूल असर होगा। इससे सैकड़ों साल पुराने ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज होगी। -डॉ. जेसी कुनियाल, वरिष्ठ वैज्ञानिक, जीबी पंत राष्ट्रीय पर्यावरण एवं शोध संस्थान