खराब रिजल्ट पर शिक्षकों की जवाबदेही से पीछे हटी सरकार
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पूर्व की सरकारों की तरह जयराम सरकार ने भी शिक्षक संगठनों के दबाव में आकर आखिरकार यू टर्न ले लिया। दसवीं और जमा दो कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं में 25 फीसदी से कम परिणाम देने वाले शिक्षकों की जवाबदेही तय करने से सरकार कतरा गई है। पूअर रिजल्ट पॉलिसी में किए गए कार्रवाई के प्रावधान भी फाइलों तक ही सिमट कर रख दिए हैं। ऐसे में गुणात्मक शिक्षा देने के दावे करने वाली राज्य सरकार की कार्रवाई करने की घोषणाएं खोखली साबित हो गई हैं।
कम परिणाम देने वाले शिक्षकों के खिलाफ हुई शिक्षा निदेशालय की कार्रवाई का अधिकांश शिक्षक संगठनों ने विरोध किया है। मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, शिक्षा सचिव से लेकर निदेशकों तक संगठनों के पदाधिकारियों ने ज्ञापन सौंप कर कम परिणाम के लिए शिक्षकों को जिम्मेवार नहीं ठहराने की मांग की।
संगठनों ने साल भर शिक्षकों से करवाए जाने वाले गैर शिक्षण कार्यों, और शिक्षकों की कमी को कम परिणाम के लिए दोषी बताया। शिक्षक संगठन बीते कई महीनों से इस कार्रवाई का लगातार विरोध करते आए हैं।
ऐसा नहीं है कि शिक्षकों ने इस कार्रवाई का पहली बार विरोध किया है।
396 स्कूलों का परीक्षा परिणाम 25 फीसदी से कम
हर साल बोर्ड परीक्षाओं की परिणाम घोषित होते ही जैसे ही सरकार कम परिणाम देने वाले शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करती है तो शिक्षक संगठन विरोध में लामबंद हो जाते हैं। शिक्षकों के विरोध के आगे सरकारें भी हर साल नतमस्तक होकर फैसला वापस लेती रही हैं।
चेतावनी देकर शिक्षकों को अगले साल कार्रवाई के प्रति चेता कर अपना फर्ज निभाती आई हैं। अब प्रदेश की सत्ता पर काबिज नई सरकार ने भी पुरानी सरकारों के नक्शे कदम पर चलते हुए कम परिणाम देने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई करने का फैसला वापस ले लिया है।
उच्च शिक्षा निदेशालय के पास पहुंचे आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के 396 स्कूलों का इस साल 25 फीसदी से कम परिणाम रहा है। इनमें बारहवीं के 91 और दसवीं के 305 स्कूल शामिल हैं। इसके अलावा 55 स्कूलों में एक भी विद्यार्थी पास नहीं हुआ है।
बारहवीं के 16 और दसवीं के 39 स्कूलों का परीक्षा परिणाम शून्य रहा है। बारहवीं में कांगड़ा और मंडी से 4-4, बिलासपुर और लाहौल-स्पीति से 3-3, चंबा और सिरमौर से 1-1 स्कूल ऐसा है, जहां एक भी बच्चा पास नहीं हुआ है।