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डलहौजी का नाम बदलने को तैयार नहीं लोग, दी आंदोलन की चेतावनी
विशाल आनंद/अमर उजाला, डलहौजी (चंबा)
Updated Mon, 18 Apr 2016 11:07 AM IST
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डलहौजी वर्ष 1854 में अस्तित्व में आया था जब ब्रिटिश शासन के दौरान पांच पहाड़ियों को चंबा के राजा से प्राप्त किया था।
- फोटो : फाइल फोटो
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हिमाचल के विश्व विख्यात पर्यटन स्थल डलहौजी का नाम बदलने की मांग का चौतरफा विरोध हो रहा है। चंबा जिला के पर्यटक स्थल डलहौजी में लोग एकजुट होकर इसका विरोध कर रहे हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार अगर इस पर्यटन स्थल का नाम बदला गया तो वे सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाएंगे। डलहौजी के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि वह शहीदों का सम्मान करते हैं।
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लेकिन इस पर्यटन स्थल की पूरे विश्व में पहचान डलहौजी के नाम से है। डलहौजी का नाम बदलने का जिन्न पहले भी निकल चुका है और इसका जबरदस्त विरोध होने के बाद इस मुद्दे को बंद कर दिया गया था। उस समय भी तत्कालीन नगर परिषद द्वारा प्रस्ताव पारित कर डलहौजी का नाम बदलने का विरोध किया था। डलहौजी के तमाम नेता, होटल एसोसिएशन, टैक्सी यूनियन, प्रेस क्लब और अन्य सभी डलहौजी के नाम को बदलने की मांग का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
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क्या है डलहौजी का इतिहास
डलहौजी वर्ष 1854 में अस्तित्व में आया था जब ब्रिटिश शासन के दौरान पांच पहाड़ियों को चंबा के राजा से प्राप्त किया था। इन खूबसूरत पांच पहाड़ियों बैलून, कथलग, पोटरियां, टिहरी और बकरोटा पर बसा है डलहौजी। सन 1854 में ब्रिटिश सेना के कर्नल नेपियर ने डलहौजी को ब्रिटिश सेना और अधिकारियों के लिए यहां की जलवायु को देखते हुए हेल्थ रिसोर्ट के रूप में चुना था।
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डलहौजी पहले पंजाब के गुरदासपुर के अंतर्गत आता था लेकिन 1966 में हिमाचल प्रदेश के पुनर्गठन के समय हिमाचल के चंबा में शामिल हो गया। डलहौजी का नाम सर लार्ड मैकलियोड के कहने पर 1854 में भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड डलहौजी के नाम पर रखा गया, जबकि लार्ड डलहौजी कभी भी डलहौजी नहीं आए।
वहीं 1863 में जीपीओ जिसे गांधी चौक के नाम से भी जाना जाता है, में पहले चर्च सेंट जॉन का निर्माण किया गया। 1870 में डलहौजी में बुलज हेड के नाम से पहला होटल बना जिसे अब होटल माउंट व्यू के नाम से जाना जाता है। 1873 में रविंद्र नाथ टैगोर डलहौजी आए और उन्हें गीतांजलि लिखने की प्रेरणा मिली। 1884 में रुडयार्ड किपलिंग डलहौजी आए। सन 1920 में पहली बार एक बड़े जनरेटर के माध्यम से डलहौजी में बिजली उपलब्ध करवाई गई। तभी से यह प्रसिद्ध पर्यटक स्थल के रूप में जाना जाने लगा।
1937 में सुभाष चंद्र बोस डलहौजी स्वास्थ्य लाभ के लिए आए थे। 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू डलहौजी के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य पर होने वाले कार्यक्रम में भाग लेने डलहौजी आए। 1959 में तिब्बती शरणार्थी डलहौजी बसे। सन 1962 ,1988 में दलाईलामा ने भी डलहौजी का दौरा किया। आज दुनिया भर में डलहौजी एक विख्यात पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है।
विधायक आशा कुमारी भी पक्ष में नहीं
डलहौजी की विधायक और राष्ट्रीय कांग्रेस कमेटी की सचिव आशा कुमारी ने कड़े शब्दों में डलहौजी का नाम बदले जाने की बात का विरोध जताया है। कहा कि राष्ट्रीय मुद्दों से भटकाने के लिए भाजपा औप विहिप ऐसे शगूफे करती है। वह सुभाष चंद्र बोस का सम्मान करती हैं।
पूर्व विधायक रेणु चड्डा का क्या कहना
डलहौजी की पूर्व विधायक रेणु चड्डा भी खुल कर डलहौजी का नाम बदले जाने का विरोध करती हैं। चड्डा ने कहा कि डलहौजी एक विख्यात पर्यटन स्थल है। इसका नाम कभी भी बदला नहीं जाना चाहिए। उनके अनुसार डलहौजी का नाम बदलना मतलब उनकी पहचान उनसे छीनना है। अगर शिमला का नाम नहीं बदला जा सकता तो डलहौजी का क्यों ?
मनोज चड्डा भी डलहौजी का नाम बदलने की मांग के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा पहले भी उठा था। तब भी नगर परिषद के वह अध्यक्ष थे। प्रस्ताव पारित कर डलहौजी का नाम बदलने का विरोध किया था। सरकार को यह प्रस्ताव भेजा था।-मनोज चड्डा, अध्यक्ष नगर परिषद डलहौजी
डलहौजी का नाम बदले जाने की मांग का पुरजोर विरोध करते हैं। अगर इसके लिए उन्हें सड़कों पर भी उतरना पड़ा तो वह इससे गुरेज नहीं करेंगे।- परमजीत सिंह, मनोनीत पार्षद व सदस्य राज्य अल्पसंख्यक बोर्ड