पंचायत चौकीदारों को नियमित करने की नहीं है कोई प्रस्तावना
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सदर विधायक सुभाष ठाकुर ने धर्मशाला विधानसभा सत्र के दौरान जनहित के लिए तारांकित प्रश्न रखे जिसमें प्रदेश में कितने पंचायत चौकीदार कार्यरत हैं। हर जिले का ब्योरा दें, पंचायत चौकीदार क्या सरकारी विभाग के कर्मचारी हैं, सरकार इनको कितने वर्ष बाद अंशकालिक से पूर्णकालिक व कितने वर्ष बाद दैनिक वेतन भोगी बनाती है।
सरकार आरएंडपी नियम बनाकर इनको नियमित करने पर विचार रखती है या नहीं। तारांकित प्रश्न का जवाब देते हुए ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री वीरेंद्र कंवर ने बताया कि वर्तमान में प्रदेश के विभिन्न जिलों में 3212 पंचायत चौकीदार जिनमें बिलासपुर 151, चंबा 283, हमीरपुर 229, कांगड़ा 748, किन्नौर 65, कुल्लू 204, लाहौल स्पिति 41, मंडी 469, शिमला 359, सिरमौर 228, सोलन 211 तथा ऊना में 224 कार्यरत हैं।
उन्होंने बताया कि पंचायत चौकीदार सरकारी विभाग के कर्मचारी नहीं है। सरकार इनको कितने वर्ष बाद अंशकालिक से पूर्णकालिक व कितने वर्ष बाद दैनिक वेतन भोगी बनाती है के बारे में उन्होंने बताया कि राज्य सरकार की ओर से ग्राम पंचायतों को इस संबंध में कोई निर्देश नहीं दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि पंचायत चौकीदारों के आरएंडपी नियम बनाकर उन्हें नियमित करने की कोई प्रस्तावना राज्य सरकार के पास विचाराधीन नहीं है।
एडीबी या ब्रिक्स से करेंगे लंबित योजनाओं की फंडिंग : महेंद्र सिंह
प्रदेश सरकार सूबे में आईपीएच विभाग की लंबित योजनाओं का काम शुरू करने के लिए केंद्र सरकार के माध्यम से एडीबी या ब्रिक्स से वित्तीय मदद लेने का प्रयास करेगी।
आईपीएच मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा कि नाबार्ड की वित्तीय स्थिति ठीक ऐसी नहीं है कि वह हिमाचल की सभी लंबित 1887 योजनाओं के लिए पैसा दे सके। इन योजनाओं के लिए करीब आठ से नौ सौ करोड़ रुपये की जरूरत है।
ऐसे में नाबार्ड में लंबित परियोजनाओं के लिए बाहरी एजेंसियों से संपर्क किया जा रहा है। जिला चंबा के डलहौजी की विधायक आशा कुमारी के सलूणी, मंजीर, सुंडला और देवी (दियूर) पेयजल योजना के लंबित होने के सवाल के जबाव में आईपीएच
मंत्री ने कहा कि नाबार्ड के पास धनराशि की कमी के कारण यह परियोजना लंबित है। विधायक पेयजल योजना के लंबित होने से दो साल में इसके निर्माण के खर्च में 16 करोड़ रुपये की वृद्घि हुई है।
साल 2016 में बनाई गई डीपीआर में योजना के लिए करीब 34 लाख रुपये खर्च का एस्टीमेट था, जबकि 2018 में यह खर्च 50 करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है।