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Shimla News: आरडीजी खत्म होने के बाद अब तलाशने होंगे आय के स्रोत
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हिमाचल विश्वविद्यालय के अध्ययन में खुलासा, वित्तीय अनुशासन बनाना और खर्चों की प्राथमिकता तय करना जरूरी
हिमाचल को अपने संसाधनों पर संभालनी होगी वित्तीय स्थिति
एक्सक्लूसिव
हर्षित शर्मा
शिमला। दो दशक तक वित्त आयोग से मिले राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) ने हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को सहारा दिया। अब यह व्यवस्था पहले जैसी नहीं रहेगी। ऐसे में राज्य के सार्वजनिक कर्ज का प्रबंधन पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) के एक अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया है। अध्ययन में कहा है कि वर्ष 2004-05 से 2023-24 तक राज्य का सार्वजनिक कर्ज व्यापक रूप से टिकाऊ रहा लेकिन इस अवधि में वित्त आयोग से मिलने वाला राजस्व घाटा अनुदान वित्तीय स्थिरता का अहम आधार रहा। अध्ययन अवधि में राजस्व घाटा अनुदान राज्य की नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का औसतन चार से पांच प्रतिशत रहा। शोधकर्ताओं का कहना है कि 16वें वित्त आयोग में इस सहायता के समाप्त होने से बाहरी वित्तीय सहारा कमजोर होगा। ऐसे में कर्ज की स्थिरता बनाए रखने के लिए राज्य को अपनी आय बढ़ाने, वित्तीय अनुशासन बनाए रखने और खर्चों की प्राथमिकता तय करने पर अधिक ध्यान देना होगा।
अध्ययन में कहा है कि अब तक सरकार ने बढ़ते कर्ज के साथ वित्तीय संतुलन बनाए रखने की क्षमता दिखाई है। भविष्य में यही स्थिति बनाए रखना कठिन होगा क्योंकि वित्तीय सहायता की जगह अब आंतरिक संसाधनों पर निर्भरता बढ़ेगी। कर्ज का प्रबंधन केवल उधार बढ़ाकर नहीं किया जा सकता। आर्थिक वृद्धि को गति देने वाली परियोजनाओं में निवेश और बेहतर वित्तीय प्रबंधन ही आगे की सबसे बड़ी जरूरत होगी। हिमाचल को प्राकृतिक आपदाओं और सीमित संसाधनों जैसी चुनौतियों को देखते हुए अतिरिक्त वित्तीय तैयारी रखनी होगी। आर्थिक विस्तार के समय वित्तीय बफर (रिजर्व) तैयार करने और दीर्घकालिक वित्तीय योजना अपनाने से भविष्य के झटकों का असर कम किया जा सकता है।
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कोविड के बाद बढ़ा ऋण अनुपात
अध्ययन के अनुसार 2004-05 में राज्य का ऋण-जीएसडीपी अनुपात करीब 60 प्रतिशत था जो 2012-13 तक घटकर 35 प्रतिशत रह गया। इसके बाद 2018-19 तक यह 35 से 37 प्रतिशत के बीच स्थिर रहा। कोविड-19 के बाद कर्ज अनुपात में फिर बढ़ोतरी दर्ज हुई। अध्ययन में औसत प्रभावी ब्याज दर 8.19 प्रतिशत, औसत नाममात्र आर्थिक वृद्धि दर 11.54 प्रतिशत और ऋण स्थिरीकरण का मान (थीटा) 0.97 बताया है जिसे अध्ययन अवधि के लिए अनुकूल माना गया है।
डॉ. तनुज के मार्गदर्शन में हुआ शोध यह अध्ययन एचपीयू के अर्थशास्त्र विभाग के शोधार्थी ईशांत नेगी ने डॉ. तनुज शर्मा के मार्गदर्शन में तैयार किया। शोध में 2005-06 से 2023-24 तक के वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण किया है। अध्ययन के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की हैंडबुक ऑफ स्टेटिस्टिक्स ऑन इंडियन स्टेट्स, स्टेट फाइनेंस : ए स्टडी ऑफ बजट्स हिमाचल सरकार के बजट दस्तावेज और आर्थिक सर्वेक्षण का उपयोग किया गया। शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मैनेजमेंट एंड इकोनॉमिक्स इन्वेंशन के वॉल्यूम-12 में 5 मई को प्रकाशित हुआ।
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हिमाचल को अपने संसाधनों पर संभालनी होगी वित्तीय स्थिति
एक्सक्लूसिव
हर्षित शर्मा
शिमला। दो दशक तक वित्त आयोग से मिले राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) ने हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को सहारा दिया। अब यह व्यवस्था पहले जैसी नहीं रहेगी। ऐसे में राज्य के सार्वजनिक कर्ज का प्रबंधन पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) के एक अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया है। अध्ययन में कहा है कि वर्ष 2004-05 से 2023-24 तक राज्य का सार्वजनिक कर्ज व्यापक रूप से टिकाऊ रहा लेकिन इस अवधि में वित्त आयोग से मिलने वाला राजस्व घाटा अनुदान वित्तीय स्थिरता का अहम आधार रहा। अध्ययन अवधि में राजस्व घाटा अनुदान राज्य की नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का औसतन चार से पांच प्रतिशत रहा। शोधकर्ताओं का कहना है कि 16वें वित्त आयोग में इस सहायता के समाप्त होने से बाहरी वित्तीय सहारा कमजोर होगा। ऐसे में कर्ज की स्थिरता बनाए रखने के लिए राज्य को अपनी आय बढ़ाने, वित्तीय अनुशासन बनाए रखने और खर्चों की प्राथमिकता तय करने पर अधिक ध्यान देना होगा।
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अध्ययन में कहा है कि अब तक सरकार ने बढ़ते कर्ज के साथ वित्तीय संतुलन बनाए रखने की क्षमता दिखाई है। भविष्य में यही स्थिति बनाए रखना कठिन होगा क्योंकि वित्तीय सहायता की जगह अब आंतरिक संसाधनों पर निर्भरता बढ़ेगी। कर्ज का प्रबंधन केवल उधार बढ़ाकर नहीं किया जा सकता। आर्थिक वृद्धि को गति देने वाली परियोजनाओं में निवेश और बेहतर वित्तीय प्रबंधन ही आगे की सबसे बड़ी जरूरत होगी। हिमाचल को प्राकृतिक आपदाओं और सीमित संसाधनों जैसी चुनौतियों को देखते हुए अतिरिक्त वित्तीय तैयारी रखनी होगी। आर्थिक विस्तार के समय वित्तीय बफर (रिजर्व) तैयार करने और दीर्घकालिक वित्तीय योजना अपनाने से भविष्य के झटकों का असर कम किया जा सकता है।
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कोविड के बाद बढ़ा ऋण अनुपात
अध्ययन के अनुसार 2004-05 में राज्य का ऋण-जीएसडीपी अनुपात करीब 60 प्रतिशत था जो 2012-13 तक घटकर 35 प्रतिशत रह गया। इसके बाद 2018-19 तक यह 35 से 37 प्रतिशत के बीच स्थिर रहा। कोविड-19 के बाद कर्ज अनुपात में फिर बढ़ोतरी दर्ज हुई। अध्ययन में औसत प्रभावी ब्याज दर 8.19 प्रतिशत, औसत नाममात्र आर्थिक वृद्धि दर 11.54 प्रतिशत और ऋण स्थिरीकरण का मान (थीटा) 0.97 बताया है जिसे अध्ययन अवधि के लिए अनुकूल माना गया है।
डॉ. तनुज के मार्गदर्शन में हुआ शोध यह अध्ययन एचपीयू के अर्थशास्त्र विभाग के शोधार्थी ईशांत नेगी ने डॉ. तनुज शर्मा के मार्गदर्शन में तैयार किया। शोध में 2005-06 से 2023-24 तक के वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण किया है। अध्ययन के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की हैंडबुक ऑफ स्टेटिस्टिक्स ऑन इंडियन स्टेट्स, स्टेट फाइनेंस : ए स्टडी ऑफ बजट्स हिमाचल सरकार के बजट दस्तावेज और आर्थिक सर्वेक्षण का उपयोग किया गया। शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मैनेजमेंट एंड इकोनॉमिक्स इन्वेंशन के वॉल्यूम-12 में 5 मई को प्रकाशित हुआ।