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सुनो सरकार! राजधानी के स्कूल का है ऐसा हाल
उषा नेगी/अमर उजाला, शिमला
Updated Sat, 20 Sep 2014 02:52 PM IST
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इससे शर्मनाक और कुछ नहीं हो सकता। इंटरवल की घंटी बजते ही बच्चे स्कूल से बाहर सड़क की तरफ भागते हैं और लाइन लगाकर सड़क किनारे लघुशंका से मुक्त होते हैं। स्कूल की लड़कियों को भी इस प्राकृतिक जरूरत से निवृत्त होने यहीं खुले में आना पड़ता है क्योंकि स्कूल में कोई टॉयलेट नहीं।
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रोज का यह नजारा कहीं और नहीं शिमला शहर का है जिस पर पूरा हिमाचल इतराता है। हैरत की बात है कि शिमला का यही नगर निगम हाल ही में दिल्ली से जन सुविधाओं के लिहाज से देश में प्रथम शहर का तगमा हासिल कर लौटा है।
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लेकिन न तो राज्य सरकार के मंत्री, अफसर और न ही नगर निगम प्रशासन को संजौली के इस स्कूल की हालत दिखाई देती है, जहां मासूम बच्चे लघुशंका व शौच से निवृत्त होने के लिए खुले में झाड़ियों की ओट तलाशते हैं।
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यह सरकारी प्राइमरी स्कूल संजौली के लक्ष्मीनारायण मंदिर के करीब है। यूं तो हर सरकारी स्कूल में छात्र-छात्राओं को साफ-सुथरे शौचालयों की व्यवस्था का दावा किया जाता है, लेकिन राजधानी के ही एक सरकारी प्राइमरी स्कूल के बच्चे खुले में लघुशंका करने के लिए मजबूर हैं।
ज्यादा मुसीबत बच्चियों को पेश आती है। वे सड़क से नीचे ढलान पर झाड़ियों की ओट में निवृत्त होती हैं। वहां से गिरने का डर भी बना रहता है। गंदगी के कारण बच्चों के बीमार होने का खतरा भी बना रहता है। लोग कहते हैं कि यहां से किसी वीवीआईपी का काफिला नहीं गुजरता। चूंकि स्कूल साधनहीन बच्चों का है, इसलिए अफसरशाही भी खामोश है।
स्कूल में लड़कों से ज्यादा लड़कियां
प्राइमरी स्कूल में 127 छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। इनमें 78 लड़कियां और 49 लड़के हैं। पहली से पांचवीं तक का यह स्कूल यहां 1962 से चल रहा है। स्कू ल में टॉयलेट न होने के कारण नगर निगम भी नोटिस भेज चुका है।
रीडर कनेक्ट
हिमाचल के स्कूलों में शौचालयों के सरकारी दावों की धरातल पर हवा निकल रही है। दूरदराज के इलाकों में ही नहीं प्रदेश के प्रमुख शहरों के स्कूलों में भी बच्चे खुले में शौच को मजबूर हैं। आपके इलाके के स्कूलों में भी ऐसी स्थिति तो नहीं?
इस मसले पर आप अपने सुझाव और शिकायतें अमर उजाला के नजदीकी कार्यालय में या aushimla@gmail.com पर भेज सकते हैं। 97360-10280 पर भी सुबह दस से शाम छह बजे तक संपर्क कर सकते हैं।