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उम्मीद की मशाल
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उम्मीद की मशाल
सेवानिवृत्ति के बाद अध्यापक
ने ईजाद की सेब की नई किस्म
रेड डिलिशियस की नई किस्म कंवर रेड में 30 दिन पहले आता है रंग
परंपरागत किस्म के मुकाबले आकार भी बेहतर
6600 फीट की ऊंचाई पर फायदेमंद हो सकती है नई किस्म
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। सेवानिवृत्त शिक्षक जोगेंद्र सिंह कंवर ने अपने बागीचे में सेब की नई किस्म ईजाद की है। म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) के जरिये तैयार हुई रेड डिलिशियस की नई किस्म कंवर रेड में सामान्य के मुकाबले करीब 30 दिन पहले पूरा रंग आ जाता है। समय से पहले तैयार होने के कारण इसे मंडियों में अच्छे दाम मिलने की उम्मीद है।
परंपरागत रेड डिलिशियस के मुकाबले नई किस्म का आकार बेहतर है। दावा है कि इसकी शेल्फ लाइफ भी सामान्य से लंबी है। 6600 फीट की ऊंचाई के बागीचों के लिए यह किस्म फायदेमंद साबित हो सकती है। ठियोग के मझोली गांव से संबंध रखने वाले जोगेंद्र सिंह कंवर जनवरी 2006 में ठियोग के कथोग स्कूल के सेवानिवृत्त हुए हैं। कंवर ने बताया कि 1961 में उनके पिता ने 80 पेड़ों का बागीचा लगाया था। 1970 में बागीचे में 28 नए पौधे लगाए।
परंपरागत किस्मों के चलते सेब में न तो अच्छा रंग आता था न ही बढ़िया आकार बनता था। 1990 में सीजन के दौरान जब सेब तुड़ान चल रहा था तो एक पौधे में ऊपरी की शाखाओं में सेब में रंग कम था लेकिन एक निचली शाखा में सेब का रंग और आकार बढ़िया था। पौधे की एक शाखा में अच्छी गुणवत्ता का सेब पैदा होने के बाद इसे परीक्षण के लिए बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र मशोबरा लेकर गए।
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वैज्ञानिकों ने जांच की लेकिन अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाई। 2012 में उन्हें आभास हुआ कि उनके बागीचे के एक पेड़ में नेचुरल म्यूटेशन (प्राकृतिक उत्परिवर्तन) से नई किस्म तैयार हो रही है। 2014 में जोंगेंद्र कंवर इस सेब को दोबारा बागवानी विश्वविद्यालय के बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र मशोबरा लेकर गए। संस्थान के सहायक निदेशक ने इन्हें इस शाखा की कलमें दूसरे पेड़ पर करने की सलाह दी ताकि सही परीक्षण किया जा सके। 2016 में कलमों के बाद फल लगे जिसके बाद संस्थान के वैज्ञानिकों ने बागीचे का निरीक्षण भी किया। 2017 में जोगेंद्र कंवर ने म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) के जरिये तैयार हुई रेड डिलिशियस की नई किस्म को लेकर पीपीवी एंड एफआरए (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटीज़ एंड फार्मर्स राइट्स अथॉरिटी) को लिखा। 2019 में नई किस्म के पंजीकरण की औपचारिकताओं के लिए सीआईटीएच श्रीनगर (केंद्रीय शीतोष्ण बागवानी संस्थान) को लिखा लेकिन कोविड कॉल के कारण निरीक्षण नहीं हो सका। हालांकि 3 सितंबर 2021 को सीआईटीएच की टीम ने बागीचे का निरीक्षण कर आवश्यक आंकड़े जुटाए।
प्रगतिशील बागवान के सम्मान से नवाजा
दिसंबर 2021 में जोगेंद्र सिंह कंवर को बागवानी विश्वविद्यालय नौणी ने प्रगतिशील बागवान के सम्मान से नवाजा। 8 अगस्त 2022 को बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र मशोबरा में आयोजित सेब महोत्सव के दौरान लगाई गई सेब प्रदर्शनी में जोगेंद्र सिंह कंवर का रेड डिलिशियस कंवर रेड सेब भी प्रदर्शित किया गया।
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सेवानिवृत्ति के बाद अध्यापक
ने ईजाद की सेब की नई किस्म
रेड डिलिशियस की नई किस्म कंवर रेड में 30 दिन पहले आता है रंग
परंपरागत किस्म के मुकाबले आकार भी बेहतर
6600 फीट की ऊंचाई पर फायदेमंद हो सकती है नई किस्म
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। सेवानिवृत्त शिक्षक जोगेंद्र सिंह कंवर ने अपने बागीचे में सेब की नई किस्म ईजाद की है। म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) के जरिये तैयार हुई रेड डिलिशियस की नई किस्म कंवर रेड में सामान्य के मुकाबले करीब 30 दिन पहले पूरा रंग आ जाता है। समय से पहले तैयार होने के कारण इसे मंडियों में अच्छे दाम मिलने की उम्मीद है।
परंपरागत रेड डिलिशियस के मुकाबले नई किस्म का आकार बेहतर है। दावा है कि इसकी शेल्फ लाइफ भी सामान्य से लंबी है। 6600 फीट की ऊंचाई के बागीचों के लिए यह किस्म फायदेमंद साबित हो सकती है। ठियोग के मझोली गांव से संबंध रखने वाले जोगेंद्र सिंह कंवर जनवरी 2006 में ठियोग के कथोग स्कूल के सेवानिवृत्त हुए हैं। कंवर ने बताया कि 1961 में उनके पिता ने 80 पेड़ों का बागीचा लगाया था। 1970 में बागीचे में 28 नए पौधे लगाए।
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परंपरागत किस्मों के चलते सेब में न तो अच्छा रंग आता था न ही बढ़िया आकार बनता था। 1990 में सीजन के दौरान जब सेब तुड़ान चल रहा था तो एक पौधे में ऊपरी की शाखाओं में सेब में रंग कम था लेकिन एक निचली शाखा में सेब का रंग और आकार बढ़िया था। पौधे की एक शाखा में अच्छी गुणवत्ता का सेब पैदा होने के बाद इसे परीक्षण के लिए बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र मशोबरा लेकर गए।
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वैज्ञानिकों ने जांच की लेकिन अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाई। 2012 में उन्हें आभास हुआ कि उनके बागीचे के एक पेड़ में नेचुरल म्यूटेशन (प्राकृतिक उत्परिवर्तन) से नई किस्म तैयार हो रही है। 2014 में जोंगेंद्र कंवर इस सेब को दोबारा बागवानी विश्वविद्यालय के बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र मशोबरा लेकर गए। संस्थान के सहायक निदेशक ने इन्हें इस शाखा की कलमें दूसरे पेड़ पर करने की सलाह दी ताकि सही परीक्षण किया जा सके। 2016 में कलमों के बाद फल लगे जिसके बाद संस्थान के वैज्ञानिकों ने बागीचे का निरीक्षण भी किया। 2017 में जोगेंद्र कंवर ने म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) के जरिये तैयार हुई रेड डिलिशियस की नई किस्म को लेकर पीपीवी एंड एफआरए (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटीज़ एंड फार्मर्स राइट्स अथॉरिटी) को लिखा। 2019 में नई किस्म के पंजीकरण की औपचारिकताओं के लिए सीआईटीएच श्रीनगर (केंद्रीय शीतोष्ण बागवानी संस्थान) को लिखा लेकिन कोविड कॉल के कारण निरीक्षण नहीं हो सका। हालांकि 3 सितंबर 2021 को सीआईटीएच की टीम ने बागीचे का निरीक्षण कर आवश्यक आंकड़े जुटाए।
प्रगतिशील बागवान के सम्मान से नवाजा
दिसंबर 2021 में जोगेंद्र सिंह कंवर को बागवानी विश्वविद्यालय नौणी ने प्रगतिशील बागवान के सम्मान से नवाजा। 8 अगस्त 2022 को बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र मशोबरा में आयोजित सेब महोत्सव के दौरान लगाई गई सेब प्रदर्शनी में जोगेंद्र सिंह कंवर का रेड डिलिशियस कंवर रेड सेब भी प्रदर्शित किया गया।