जीत की खुमारी में प्राथमिकताएं देना भूल गए मंत्री और विधायक
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हिमाचल में कुछ मंत्री और विधायक क्या जीत के नशे में ही चूर रह गए? उन्होंने वक्त पर योजना विभाग को अपने-अपने क्षेत्रों की सड़कों-पुलों, पीने के पानी और लघु सिंचाई योजनाओं की प्राथमिकताएं ही नहीं दीं। पहली बार चुने गए विधायक ही नहीं, बल्कि मंत्रियों और पूर्व मंत्रियों तक अपने इस दायित्व को निभाने से चूक गए।
इस हालात में राज्य सरकार के योजना और वित्त महकमों को विधायकों की अज्ञात योजनाओं के नाम पर 25-25 हजार रुपये का टोकन बजट डालना पड़ा। विधायक प्राथमिकता की बजट बुक में लोग अपने क्षेत्रों की स्कीमें ढूंढ रहे हैं, मगर उन्हें इसमें नोट के साथ खाली कॉलम ही नजर आ रहे हैं। मार्च में बजट पेश करने से काफी पहले मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की अध्यक्षता में विधायक प्राथमिकता बैठक का आयोजन किया गया।
इसमें तमाम विधायकों को बता दिया गया था कि वे वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए वास्तविक नई योजनाएं (आरएनएस) घटक के तहत अपने-अपने क्षेत्रों की छह-छह प्राथमिकताएं दें। योजना विभाग की ओर से भी उन्हें सूचित किया जाता रहा। आरएनएस के अलावा उन छह-छह चालू योजनाओं का भी ब्योरा मांगा गया, जिनके लिए अतिरिक्त बजट की जरूरत है। इन प्राथमिकताओं में दो-दो योजनाएं सड़कों-पुलों की, दो-दो पीने के पानी की और दो-दो सिंचाई के पानी की मांगी गईं।
इसके लिए विधायकों को एक प्रारूप भी दिया गया, लेकिन कई विधायक बहुत सी योजनाएं तय ही नहीं कर पाए। नौ मार्च को पेश किए गए बजट से पहले विधायकों की प्राथमिकता की पुस्तिका में बहुत से कॉलमों में ‘माननीय विधायक से स्कीम प्राप्त होने पर शामिल की जाएगी’ लिखकर ही काम चलाना पड़ा।
इन क्षेत्रों के विधायकों से समय पर नहीं मिले स्कीमों के नाम
भटियात, चंबा, भरमौर, चुराह, ज्वालामुखी, नूरपुर, धर्मशाला, हरोली, इंदौरा, फतेहपुर आदि निर्वाचन क्षेत्रों के विधायकों ने न तो सड़कों-पुलों की प्राथमिकताएं वक्त पर योजना विभाग को भेजीं, न ही पीने के पानी और लघु सिंचाई की ही किसी स्कीम की प्राथमिकता दी।
इसलिए ही इनकी प्राथमिकताओं को बजट बुक में शामिल नहीं किया जा सका। हालांकि, राज्य सरकार के योजना विभाग में इनकी ओर से योजनाओं को अब भेजा जा रहा है।
ऐसा पहले भी होता रहा है: डॉ. बाल्दी
अतिरिक्त मुख्य सचिव वित्त एवं योजना डॉ. श्रीकांत बाल्दी ने कहा कि जिन विधायकों से पहले प्राथमिकताएं नहीं आ पाई थीं, वे अब आ रही हैं। इन्हें बाद में भी बजट में शामिल किया जा सकता है। ऐसा पहले भी होता रहा है।