एनजीटी के निशाने पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन, पद से हटाया
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प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन कुलदीप सिंह पठानिया की नियुक्ति नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निशाने पर हैं। ट्रिब्यूनल ने हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए सरकार से पूछा है कि आखिर किस आधार पर वर्तमान चेयरमैन की नियुक्ति की गई है।
सरकार की दलीलों से असंतुष्ट एनजीटी ने न सिर्फ पठानिया को हटाने को कहा है बल्कि सरकार को यह भी निर्देश दिए हैं कि बोर्ड चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर बनाकर उसके आधार पर ही नियुक्ति करे।
एनजीटी के इस आदेश के बाद अब विभाग और सरकार असमंजस की स्थिति में है। दरअसल, एनजीटी में कुछ समय पहले देशभर के विभिन्न प्रदेशों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैनों की नियुक्तियों को लेकर शिकायत हुई थी।
पठानिया की कुर्सी पर मंडराने लगा खतरा
इस पर एनजीटी ने हिमाचल समेत सभी प्रदेशों से जवाब तलब किया था। सूत्रों के अनुसार कोर्ट के पूछने पर हिमाचल सरकार ने दलील दी थी कि चूंकि वर्तमान चेयरमैन बीएससी साइंस पास हैं और उनको पर्यावरण में गहरी रुचि है, ऐसे में इस पद पर उनकी नियुक्ति की गई है। सरकार के इस जवाब को एनजीटी ने खारिज कर दिया और चेयरमैन को हटाने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही निर्देश दिए हैं कि इस पद पर नियुक्ति के लिए एक एसओपी तैयार की जाए और कई लोगों के आवेदन लेकर उनकी पर्यावरण की रुचि व ज्ञान के आधार पर ही नियुक्ति की जाए। एनजीटी के इस आदेश के बाद पठानिया की कुर्सी पर खतरा मंडराने लगा है। जानकारों का कहना है कि फिलहाल सरकार एनजीटी के इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
फोरलेन निर्माण में अनियमितताओं पर सरकार से रिपोर्ट तलब
कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन निर्माण में अनियमितताओं को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदेश सरकार से रिपोर्ट तलब की है। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की बेंच ने सरकार को फोरलेन निर्माण में बरती जा रही अनियमितताओं पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने आदेशों में कहा कि तय समय में सरकार ने रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश नहीं की तो सरकार को 50 हजार रुपये जुर्माना लगाया जाएगा।
फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदनलाल ने मामले को लेकर एनजीटी में केस दर्ज किया था। इसमें बताया था कि सड़क निर्माण नियमों को ताक पर रखकर किया जा रहा है। फोरलेन निर्माण से निकलने वाले मलबे को सतलुज नदी में डाला जा रहा है। इससे नदी को नुकसान पहुंच रहा है।
वन संपदा भी बर्बाद हो रही है। समिति ने कई और गंभीर पहलू कोर्ट के समक्ष रखे हैं। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 2 मई के फैसले में प्रदेश सरकार से रिपोर्ट तलब की है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सरकार सात दिन में मामले की रिपोर्ट दे। सरकार अभी तक इस मामले में रिपोर्ट जमा नहीं करवा पाई है।
इसके बाद प्रदेश सरकार के अधिवक्ता ने 29 मई को कोर्ट को बताया रिपोर्ट तैयार करने के लिए प्रदूषण बोर्ड से रिपोर्ट मांगी गई है। इस कारण मामले की रिपोर्ट तैयार करने में कुछ समय लगेगा। इस पर कोर्ट ने अगली सुनवाई जुलाई में रखी है। उल्लेखनीय है कि एनजीटी पूर्व में अपने आदेशों में साफ कर चुका है कि अगर निर्माण कार्य में मलबा नदी में डाला गया और आरोप सिद्ध हो गया तो फोरलेन निर्माण का कार्य कोर्ट रोक भी लगा सकता है।