377 पुरानी परंपरा के साथ चंबा के मिंजर मेले का आगाज
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377 पुरानी परंपरा के साथ सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक चंबा का मशहूर मिंजर मेला मिर्जा परिवार के मंदिर में मिंजर चढ़ाते ही आरंभ हो गया। रविवार को चंबा के मिर्जा परिवार के मुखिया एजाज मिर्जा ने अपने हाथों से बनाई मिंजर को लक्ष्मीनारायण मंदिर में अर्पित करके 17वीं शताब्दी से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाया।
एक सप्ताह तक चलने वाले इस ऐतिहासिक मेले को हिंदू एवं मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग सदियों से एक साथ मनाते आ रहे हैं। मिर्जा परिवार, मंदिर के पुजारी, जिला प्रशासन और नगर परिषद चंबा के पदाधिकारियों ने शहर के मंदिरों की पूजा-अर्चना और मिंजर अर्पित करने के बाद चौगान मैदान तक शोभायात्रा निकाली।
इस बार भी मेले के शुभारंभ पर राज्यपाल नहीं पहुंच सके। खाद्य आपूर्ति मंत्री किशन कपूर ने चौगान मैदान में प्रदर्शनियों का उद्घाटन कर मेले का विधिवत आगाज किया। सांस्कृतिक संध्याओं की शुरुआत पारंपरिक वाद्य यंत्रों और कुंजड़ी-मल्हार से हुई। पहली संध्या में पंजाबी गायक कुलविंद्र बिल्ला ने समां बांध दिया।
राजा पृथ्वी सिंह ने किया था मेला शुरू
मिंजर मेले के समापन चार अगस्त को मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर करेंगे। मुख्यमंत्री मंजरी गार्डन से प्रतीक के रूप में नारियल विसर्जित करेंगे। पहले यहां पशुबलि की प्रथा थी। जीवित भैंसे को रावी नदी में छोड़ा जाता था। बलि पर प्रतिबंध लगने के बाद यह प्रथा प्रतीक रूप में होती है।
मिंजर मेले में इस बार भी कई राज्यों के व्यापारी चंबा पहुंचे हैं। हर साल मिंजर मेले में करोड़ों का कारोबार होता है। मिंजर मेले के दौरान हस्तशिल्प का सामान खास तौर पर यहां बिकता है।
मुगलकाल में शाहजहां के शासनकाल में 1641 में राजा पृथ्वी सिंह भगवान रघुनाथ के चिह्न को चंबा लाए थे। शाहजहां ने मिर्जा साफी बेग को राजदूत के रूप में चंबा भेजा था। मिर्जा परिवार जरी और गोटे के काम में निपुण था। साफी बेग ने भगवान रघुनाथ को मिंजर चढ़ाई और यह परंपरा शुरू हो गई। राजा पृथ्वी सिंह के एलान के बाद यहां मेला शुरू हुआ जो आज तक कायम हैं।