यहां करें महादेव की मणि के साक्षात् दर्शन, वीडियो
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माये नी मेरिये शिमले री राहे चंबा कितनी दूर। ये लाइनें बिल्कुल सटीक बैठती हैं, जब आप शिमला से मणिमहेश की यात्रा पर निकलते हैं। शिमला से चंबा 378 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए हमें बस में करीब 16 घंटे का सफर करना पड़ा। इसके बाद चंबा से भरमौर के लिए फिर बस से करीब 65 किमी की दूरी तय करनी पड़ी। इसमें चार घंटे लगे।
चंबा से भरमौर का रास्ता इतना खतरनाक है कि जिसका अंदाजा लगाना आसान नहीं। रावी के किनारे से गुजरते हुए जब हमने नीचे की तरफ देखा तो एकबारगी रूह कांप उठी। चारों तरफ पहाड़ और जगह जगह चमेरा बांध की साइटें हैं। भरमौर से हड़सर करीब 13 किमी दूर है। हड़सर पहुंचने के लिए आप टैक्सी या फिर बस से भी जा सकते हैं। इस सफर में आधा घंटा लग जाता है। शिमला से हड़सर 456 किमी दूर है। करीब 20 घंटे आप बस में ही सफर करेंगे।
हड़सर से शुरू होती है यात्रा
हड़सर से मणिमहेश डल झील 14 किमी है। चारों तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ और दूर-दूर तक मोबाइल नेटवर्क नहीं है। इस यात्रा में चार पड़ाव आते हैं। धनछो, सुंदरासी, गौरी कुंड, फिर मणिमहेश डल झील। हमने शाम को 6.30 बजे पैदल यात्रा शुरू की और सवा घंटे में थक गए। हमें आराम के लिए रुकना पड़ा।
हम 1 घंटा 20 मिनट लगातार पैदल चले थे। रास्ते में श्रद्धालु मिले। 8.30 पर हम धनछो पहुंचे। हिमाचल के मंडी जिले के लोगों ने लंगर लगाया था। हमने लंगर में राजमा के साथ भिंडी और चपाती का मजा लिया। करीब आधा घंटे तरोताजा होने के बाद 9 बजे सुंदरासी के लिए चल पड़े।
सुंदरासी तक का रास्ता सबसे मुश्किल
धनछो से सुंदरासी पहुंचने में 2.30 घंटे लग गए। रात के करीब 11.30 बज चुके हैं। रास्ते में कुछ पहाड़ ऐसे हैं, जहां से पत्थर गिरते हैं। पहली बार हम ऐसी दुर्गम यात्रा पर निकले थे। अंधेरे में हमें शायद रास्ते का पता न चलता, लेकिन इस बीच दो और लोग मिले और उनके साथ यात्रा की।
इनमें से एक ने कहा, यहां पत्थर गिरते हैं, तेजी से चलना। सुंदरासी से गौरी कुंड तक पहुंचने में डेढ़ घंटा लगा। रात को करीब 1 बजे गौरी कुंड पहुंचे। यहां एक टेंट में रुके। थके थे नींद तुरंत आ गई। सुबह करीब 8 बजे उठे और फिर डल झील के लिए चल पड़े। यह रास्ता सबसे छोटा है। 23 मिनट में डल झील पहुंच गए।
नीला आसमां और सर्द हवाएं
मणिमहेश डल झील 13390 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और मणिमहेश कैलाश 18547 फीट की ऊंचाई पर है। यहां चारों तरफ दूर-दूर तक कोई पेड़ नहीं, लेकिन हवाएं बेहद सर्द चलती हैं। इसलिए शायद इन्हें बाबा बर्फानी भी कहा जाता है। यहां दिन को तापमान करीब 15 से 18 डिग्री तक रहता है।
खाना-पीना सब मुफ्त- अब हम पवित्र डल झील पहुंच चुके हैं। यहां लंगर लगे हुए हैं। चाय, खाना सब मुफ्त। रात को ठहरने के लिए सौ रुपये में अच्छा खासा इंतजाम। स्लीपर बैग लो और टेंट में सो जाओ।
चार बजे दिव्य मणि के दर्शन
सुबह चार बजे का नजारा अद्भुत होता है। कैलाश पर्वत के ऊपर पहले चंद्रमा और फिर दिव्य मणि दिखाई देती है। हर हर महादेव के जयकारे का उद्घोष चारों तरफ गूंजने लगता है। सुबह चार बजे तो डल झील का पानी भी जम जाता है, लेकिन श्रद्धा के आगे ठंड कहां टिकती है। लोग आस्था की डुबकी लगाने से फिर भी पीछे नहीं हटते।
चौपर सेवा भी उपलब्ध- डेक्कन कंपनी भरमौर से गौरी कुंड तक चौपर सेवा मुहैया करवा रही है। इसके लिए लोगों को मौके पर ही टिकट दिए जा रहे हैं। चौपर से सिर्फ 4 से 5 मिनट के भीतर आप गौरी कुंड पहुंच जाते हैं। यहां से डल झील तक पैदल रास्ता सिर्फ आधे घंटे का है। भरमौर से गौरी कुंड तक का किराया 2914 रुपये है।
देखिए पूरा वीडियो
मान्यता है कि गद्दी ने भेड़ों के साथ मणिमहेश कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन वह पत्थर बन गया था। कहा जाता है कि कैलाश पर्वत के आसपास जितने छोटे पर्वत हैं, वह गद्दी की भेड़ें थीं।
इसके बाद एक सांप ने इस पर्वत पर चढ़ना चाहा, लेकिन उसका भी यही हाल हुआ। 1968 में जापान की टीम ने मणिमहेश कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन सफल नहीं हो पाई थी।