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चुनावी मुद्दा: हिमाचल के पहाड़ों पर सात दशकों से आगे नहीं बढ़ी रेल

Wed, 10 Apr 2019 03:21 PM IST
Krishan Singh न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Wed, 10 Apr 2019 03:21 PM IST
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lok sabha election 2019:railway connectivity in himachal still in poor stage after seven decades
कालका-शिमला रेल - फोटो : अमर उजाला

हिमाचल के पहाड़ों को जरूरत के हिसाब से रेल मार्गों से नहीं जोड़ा जा सका है। ज्यादातर ट्रेनें आज भी अंग्रेजों के बनाए रेलमार्गों पर ही दौड़ रही हैं। आजादी के बाद रेलवे ट्रैक को नाममात्र का ही विस्तार दिया जा सका है।

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यहां छोटी ट्रेनें नेरोगेज ट्रैक पर हांफते हुए चलती नजर आती हैं। रेल मार्गों को ब्रॉडगेज करने का सपना भी अधूरा है। ऐसे में हिमाचल की ट्रेन कनेक्टिविटी का मुद्दा पिछले कई चुनावों की तरह इस बार भी जनता के जेहन में फिर ताजा हो गया है। 
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दरअसल, केंद्र में सत्ता में आई तमाम सरकारों को हिमाचल के लोगों ने हर बार उम्मीद भरी नजरों से देखा है। हर साल रेल बजट से आस बंधती रही लेकिन, हिमाचल की लगभग हर बार अनदेखी हुई।
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घोषणाएं हुईं भी तो वे धरातल पर नहीं उतरीं। रेल मार्गों के केंद्रीय विषय होने के चलते हिमाचल की सरकारें भी इस बारे में ज्यादा ध्यान नहीं दे पाईं। हिमाचल की तीन प्रमुख प्रस्तावित रेल लाइनें अधर में फंसी हैं।

अभी नंगल-तलवाड़ा रेल लाइन को बनाने में लगेगा वक्त 

lok sabha election 2019:railway connectivity in himachal still in poor stage after seven decades
सांकेतिक तस्वीर

कहीं भूमि अधिग्रहण तो कहीं बजट की कमी बाधा बनी हुई है। चौथी सामरिक महत्व की बड़ी प्रस्तावित रेललाइन अभी बिलासपुर से लेह तक रेल ले जाने का मामला भी शुरुआती दौर में ही है।

हेरिटेज रेल लाइन शिमला-कालका पर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए जरूर कई प्रयोग हो रहे हैं, लेकिन शिमला जल्दी पहुंचने की चाह रखने वाले इस विकल्प को कम ही इस्तेमाल करते हैं। नंगल-तलवाड़ा रेल लाइन को पूरा होने में अभी बहुत वक्त लगेगा।

इस रेललाइन का काम अंब से अंदौरा और अंदौरा से दौलतपुर के बीच कछुआ चाल से चल रहा है। बचे कई किलोमीटर के फासले का अब तक भूमि अधिग्रहण कार्य चल रहा है। 83.74 किलोमीटर लंबे इस प्रस्तावित रेलमार्ग पर करीब 2100 करोड़ की अनुमानित लागत आ रही है।

बद्दी रेल लाइन में सहयोग नहीं दे रहे पड़ोसी राज्य 

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सांकेतिक तस्वीर

दूसरा प्रस्तावित रेल मार्ग चंडीगढ़ से बद्दी के बीच है। 33.23 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन पर 1672 करोड़ का अनुमानित खर्च आ रहा है। इसमें आधा खर्च हिमाचल सरकार और आधा केंद्र सरकार को उठाना है। सर्वे हो चुका है।

इसके लिए भी भू अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी की जानी है, लेकिन हिमाचल के सामने इस रेल मार्ग को बनाने के लिए जमीन मुहैया करवाना और बजट का प्रबंध करने की चुनौतियां हैं। पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा से अपेक्षित सहयोग का न मिलना भी इसकी धीमी गति का एक कारण है। 

भानुपल्ली-बिलासपुर रेल लाइन के लिए बजट जुटाना चुनौती 

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सांकेतिक

तीसरा रेल मार्ग भानुपल्ली-बिलासपुर है। इसमें भू अधिग्रहण का काम जारी है। इसे रेल विकास निगम लिमिटेड बना रहा है। इस प्रस्तावित मार्ग की कुल लंबाई 63.1 किलोमीटर है। इस पर अनुमानित लागत 2967 करोड़ आएगी।

इसे बनाने में भारत सरकार 50 फीसदी, रेल मंत्रालय 25 फीसदी और हिमाचल सरकार 25 प्रतिशत खर्च उठाएगी, लेकिन भूमि अधिग्रहण की लागत संयुक्त रूप से केवल 70 करोड़ तक लागत ही 50:25:25 प्रतिशत के अनुपात से वहन की जाएगी।

बाकी हिमाचल को खुद उठानी होगी। ऐसे में हिमाचल सरकार के समक्ष भूमि मुहैया करवाने और बजट का प्रावधान करने जैसी दोनों ही परेशानियां हैं। लेह-लद्दाख से सटी चीन सीमा तक रेल ले जाने के लिए भानुपल्ली-बिलासपुर रेलवे बेस लाइन होगी। 

यूनेस्को के हेरिटेज शिमला-कालका 

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कालका-शिमला रेल - फोटो : अमर उजाला

शिमला-कालका रेल मार्ग यूनेस्को की ओर से भी विश्व धरोहर घोषित है। ब्रिटिश शासन की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला को कालका से जोड़ने के लिए 1896 में दिल्ली-अंबाला कंपनी को इस रेलमार्ग के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

समुद्र तल से 656 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कालका (हरियाणा) रेलवे स्टेशन को छोड़ने के बाद ट्रेन पहाड़ियों के घुमावदार रास्ते से गुजरते हुए 2,076 मीटर ऊपर स्थित शिमला तक आती है। इस रेल मार्ग पर भी छोटी ट्रेनें चल रही हैं जो काफी धीमी चलती हैं।

इस मार्ग का महत्व केवल ऐतिहासिक धरोहर के कारण ही है। इसके बजाय पर्यटक शिमला सड़क पर चलने वाली गाड़ी से जल्दी पहुंच जाते हैं। हाल ही में इस पर पारदर्शी कोच जोड़कर पर्यटकों को इस ट्रैक पर आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। 

क्या कहते हैं नेता 

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सतपाल सत्ती - फोटो : social media

भाजपा के शासनकाल में ही रेल ऊना में दौलतपुर चौक तक पहुंच गई है। यहां के लिए पांच साल में छह गाड़ियां लगी हैं। ऊना से हमीरपुर तक सर्वेक्षण हो चुका है। हिमाचल में ही नहीं, पूरे देश में पहाड़ी क्षेत्रों में भी रेल मार्गों की कमी है। इन सबके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। कांग्रेस ने 52 साल तक शासन किया, मगर यह भ्रष्टाचार में ही फंसी रही। रेल मार्गों के मामले में पांच साल में गति मिली है और इसे और तेज करेंगे।  
- सतपाल सिंह सत्ती, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष

शिमला-कालका रेल मार्ग हिमाचल के एक अनपढ़ इंजीनियर की देन है और आजादी के बाद यहां के राजनेता और प्रशासक रेल विस्तार के लिए दबाव नहीं बना पाए जबकि यहां के नेता केंद्रीय मंत्रालयों में भी रहे। हमने व्यवस्था को जगाने के लिए बाबा भलकू के नाम से साहित्यिक यात्रा निकाली थी। आज मनाली और शिमला से आगे पर्यटन नहीं बढ़ पाया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।  
- एसआर हरनोट, जाने-माने साहित्यकार और पूर्व उपमहाप्रबंधक सूचना, हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम, शिमला। 

कंटेनर डिपो बना दिया, रेल नहीं पहुंचाई
बीबीएनआईए के अध्यक्ष शैलेष अग्रवाल का कहना है कि औद्योगिक केंद्रों को रेलवे से जोड़ा जाना जरूरी है। केंद्र सरकार ने बद्दी में माल ढुलाई के लिए एक कंटेनर डीपो खोला है लेकिन, इसका उद्योगपतियों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। अब तक बीबीएन को रेलवे से जोड़ने की बातें और वादे तो किए गए हैं लेकिन किसी भी सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई है। 

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