कशैणी अग्निकांडः दूसरे दिन भी गूंजती रहीं सिसकियां, उठता रहा बर्बादी का धुआं
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ऐतिहासिक कशैणी गांव में आग के जख्मों की सिसकियां दूसरे दिन वीरवार को भी गूंजती रहीं। दिन भर जले घरों की लकड़ियों और अन्य सामान से बर्बादी का धुआं उठता रहा।
कभी जो गांव ऐतिहासिक पहचान के साथ आबाद था, आज वहां ढांढस बंधाने वालों का तांता लगा हुआ है। वीरवार सुबह से ही पीड़ितों को दिलासा देने वालों का तांता लगा रहा।
देर शाम तक यही सिलसिला जारी रहा, लेकिन अंधेरा छाने पर पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया। जले घराें के मलबे में दबीं चिंगारियां बुधवार तड़के की तबाही की दास्तान बयान करती रहीं।
बच्चे न स्कूल गए न मवेशियों को चारा मिला
वीरवार को न बच्चे सुबह उठकर स्कूल गए न रोज की तरह मवेशियों को चारा मिल पाया। खेत और बाग-बगीचे भी किसानों-बागवानों की राह देखते रहे। गांव इस अनचाहे त्रासद बदलाव से कब तक उबर पाएगा, फिलहाल कहना मुश्किल है।
पीड़ित परिवारों को अब मकान के साथ-साथ रोटी और कपड़े की चिंता सताने लगी है। हालांकि, उनकी सुध लेने रिश्तेदार पहुंच रहे हैं और गांव के बचे घरों से भी मदद मिल रही है। बावजूद इसके आने वाले कल में क्या होगा, यह चिंता प्रभावित परिवाराें को खाए जा रही है।
बेटी की शादी के लिए रखा सामान भी नहीं बचा
कशैणी गांव के राजिंद्र और नैना जनारथा अपनी बेटी की शादी की तैयारी कर रहे थे। घर में बेटी की शादी के लिए जेवर, कपड़े सहित लाखों का सामान घर में जमा किया हुआ था।
बुधवार सुबह के समय आग लगने के बाद पांव में पहनने के लिए बूट तक नहीं बचा सका। पुश्तैनी संपत्ति के साथ घर में बेटी की विदाई के लिए जुटाया गया सामान भी आग की भेंट चढ़ गया।
अब परिवार को दो वक्त की रोटी की चिंता सता रही है। बेटी की विदाई के लिए पिता को अब दूसरों के सामने हाथ पसारने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। गांव के लोगों ने सीएम से भी बेटी की शादी के लिए सहयोग की अपील की है।