कारगिल विजय दिवस: स्कूल के रिकॉर्ड से गायब हो गया इस शहीद का नाम
एक तरफ पूरा देश कारगिल विजय दिवस के शौर्य की गाथा गुनगुना रहा है, वहीं दूसरी ओर इस युद्ध में प्राण न्योछावर करने वाले शहीद मनोहर राणा का नाम सरकार ने उस स्कूल से हटा दिया जिसके प्रमाणपत्रों पर कभी शहीद का नाम छपता था।
कुठारबीत गांव से संबंध रखने वाले कारगिल शहीद मनोहर राणा के परिजनों को अब न ही शहीदी दिवस पर बुलाया जाता है, न ही अन्य कार्यक्रमों में। यहां तक कि प्रदेश सरकार या प्रशासन अभी तक इस जांबाज के नाम पर कोई गेट के रूप में स्मारक तक नहीं बना पाई है।
सरकार ने स्थानीय पाठशाला में शहीद मनोहर राणा का नाम बकायदा जोड़ा था, जो स्कूल के बाहरी गेट पर अंकित भी है। लेकिन जब से मिडिल स्कूल अपग्रेड हुआ शहीद का नाम सरकारी रिकॉर्ड से गायब हो गया।
ग्राम पंचायत प्रधान एवं शहीद मनोहर की भाभी संतोष कुमारी ने बताया कि पहले बच्चों को जो आठवीं के प्रमाण पत्र मिलते थे, उनमें शहीद मनोहर का नाम अंकित होता था, लेकिन अब स्कूल के अपग्रेड होने के बाद उनका नाम हटा दिया गया है।
हरोली विधानसभा क्षेत्र के कुठारबीत का रणबांकुरा राइफलमैन मनोहर राणा कारगिल युद्ध के दौरान 7 जुलाई 1999 को मात्र 26 साल की उम्र में दुश्मनों से लोहा लेते शहीद हुआ था। शहीद मनोहर को ऊना जिला के दूसरे कारगिल शहीद के नाम से भी जाना जाता है।
उनकी शहादत के बाद सरकारी घोषणा के अनुसार भाई को नौकरी मिली। पेट्रोल पंप शीघ्र ही आवंटित कर दिया गया। उनके गांव में स्थित कुठारबीत स्कूल का नाम भी शहीद मनोहर राणा के नाम पर कर दिया गया। लेकिन स्कूल के अपग्रेड होने के बाद यह नाम सरकारी रिकॉर्ड से गायब हो गया।
मां को स्मारक न बनने का मलाल
अभी तक शहीद के नाम का कोई भी शहीदी स्मारक नहीं बन पाया। हालांकि शहीद की माता कमला देवी ने अपने खर्च पर गांव के स्कूल में एक कमरा व बरामदा और गांव पूबोवाल के स्कूल में जहां से मनोहर ने दसवीं कक्षा की परीक्षा पास की थी उसमें दो कमरे व एक बरामदा बनाया। जिसके बाद ही कुठारबीत स्कूल पर शहीद का नाम अंकित किया गया। वहीं, शहीद बेटे के नाम पर एक गेट तक नहीं बनने पर शहीद की माता कमला देवी को अभी भी इस बात का रंज है कि किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया।
निर्माण सामग्री तक उठा कर ले गए लोग
शहीद के पिता ओम प्रकाश राणा ने गांव में आने वाली सड़क पर शहीद के नाम पर गेट का निर्माण भी शुरू करवाया था, लेकिन इस दौरान उनकी मौत हो गई। इसके बाद न ही सरकार ने और न ही प्रशासन ने इस गेट के निर्माण कार्य को शुरू करवाने में दिलचस्पी दिखाई। यहां तक कि लोग गेट निर्माण के लिए शहीद के परिजनों द्वारा लाई सामग्री को भी उठाकर ले गए। वहीं, अब सरकार की ओर से शहीद का नाम लेने वाला भी कोई नहीं है। यहां तक कि जन्मदिन और शहीदी दिवस पर भी अब कोई नहीं पूछता है। शहीद का बड़ा भाई मोहन लाल बीएसएफ में कार्यरत है।