शीत मरुस्थल में महिलाओं की जिद से रुका इस वन्य जीव का शिकार
इसी का नतीजा है कि अब इनकी संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। रिहायशी इलाकों में भी आईबैक्स को झुंडों में बेखौफ घूमते देखा जा सकता है। घाटी की महिलाओं ने आठ साल पहले आईबैक्स को बचाने के लिए मुहिम चलाई थी।
इन्होंने आईबैक्स का शिकार करते पकड़े जाने पर हुक्का-पानी तक बंद करने की चेतावनी दी थी। इसी का असर है कि पिछले आठ सालों में पुलिस और वन विभाग के पास आईबैक्स के शिकार का एक भी मामला सामने नहीं आया है।
विलुप्त होने वाली आईबैक्स की संख्या में कई गुना इजाफा
वन विभाग खुद मानता है कि घाटी की महिलाओं की वजह से विलुप्त होने वाली आईबैक्स की संख्या में कई गुना इजाफा हुआ है। इन दिनों लाहौल की चोटियां बर्फ से लकदक हैं। लिहाजा, आईबैक्स समेत कई प्रजातियां रिहायशी इलाकों में घूमती देखी जा सकती हैं।
जनजातीय इलाकों में ज्यादातर लोग मांसाहारी होते हैं। बकरी प्रजाति का आईबैक्स उनका सबसे आसान शिकार होता है। टंगरोल शाकाहारी होता है और हमला भी नहीं करता है। इस प्रजाति को बचाने के लिए सबसे पहले क्वारिंग गांव की महिलाएं आगे आईं।
महिलाओं ने इसे अभियान बना लिया। उनकी देखादेखी पूरी घाटी में महिलाओं ने इसके शिकार पर पाबंदी लगा दी। क्वारिंग की महिलाएं पर्यावरण बचाने के लिए भी आगे आई हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र में पेड़ कटान पर भी रोक लगा रखी है।
वन विभाग लाहौल के डीएफओ जयराम ने माना कि घाटी की महिलाएं पेड़ कटान और वन्य प्राणियों की सुरक्षा को लेकर काफी सजग हैं। उन्होंने माना कि पिछले आठ सालों में आईबैक्स के शिकार का एक भी केस सामने नहीं आया है। आईबैक्स की गणना का कोई प्रावधान नहीं है।
लाहौल घाटी में ये हैं दुर्लभ वन्य प्राणी
लाहौल घाटी के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फानी तेंदुआ, आईबैक्स, हिमालयन रेड फॉक्स, तिब्बतियन वूली हेयर, ब्लू शिप, काला व भूरा भालू, विसल आदि वन्य प्राणी पाए जाते हैं। इनके संरक्षण में ग्रामीण अहम भूमिका निभा रहे हैं।
- 20 डिग्री तापमान में रह लेता है आईबैक्स
बर्फीले इलाकों में जिंदा रहने के लिए आईबैक्स काफी जद्दोजहद करता है। बर्फ में -20 डिग्री तापमान में यह वन्य प्राणी आसानी से रह लेता है। इसके लंबे सींग ही इसे अन्य जानवरों से बचाता है। ये पहाड़ों पर भी आसानी से चढ़ जाता है। इसका वजन 140 किलो तक होता है।