ग्राउंड वाटर रेगुलेशन एक्ट के नियमों को रिवाइज करे सरकार
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हाईकोर्ट ने समानता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए सरकार को आदेश दिए हैं कि वह ग्राउंड वाटर रेगुलेशन, कंट्रोल एंड मैनेजमेंट एक्ट 2005 के तहत बनाए गए नियमों और नीतियों का फिर अवलोकन करे।
कोर्ट ने अधिनियम के तहत बनाए गए कुछ नियमों को खामियों से भरा बताते हुए कहा कि यह नियम अस्पष्ट, अपरिहार्य है और इनका आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने चेतन कुमार और अन्यों द्वारा जनहित में दायर याचिका का निपटारा करते हुए 8 सप्ताह के भीतर स्पष्ट नीति बनाने के आदेश दिए।
कोर्ट ने पाया कि मौजूदा नीति के तहत बोरवेल से भूजल निकालने वाले निजी व्यवसायियों पर कोई ऐसी स्पष्ट शर्त नहीं लगाई गई है कि वह कितने पानी का प्रतिदिन के हिसाब से दोहन करेंगे। यह भी स्पष्ट नहीं है कि वह स्थानीय लोगों को कितनी मात्रा व कितने समय तक पानी मुहैया कराएंगे।
समानता के अधिकार को नजरअंदाज कर अगर निजी व्यवसायी पानी का अधिकतर उपयोग अपने लिए व कुछ ऊंची पहुंच रखने वालों के लिए करेंगे तो उन पर नजर रखने के लिए कोई स्थायी व्यवस्था नहीं की गई है।
उल्लेखनीय है कि उपरोक्त अधिनियम के तहत निजी लोगों व व्यवसायियों को कुछ शर्तों के साथ बोरवेल से पानी निकालने की परमिशन दी जाती है। इसमें एक पानी का कनेक्शन स्थानीय गांव को देना भी शामिल है।
कसौली तहसील में पड़ने वाले गांव सनावड़ के कुछ बाशिंदों ने उनके क्षेत्र में स्थित बोरवेल से वांछित पानी न मिलने पर बोरवेल परमिट मालिक के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। प्रार्थियों का आरोप है कि मैसर्स शुभम प्रोपमार्ट लिमिटेड ने जो बोरवेल की परमिशन ली है, वह गैरकानूनी है।
उन्हें इस बोरवेल से कोई पानी नहीं मिल पा रहा है। कसौली गड़खल की ग्राम सभा ने उपरोक्त बोरवेल परमिट को रद्द करने का प्रस्ताव भी पारित किया था। मामले के लंबित रहते कोर्ट के आदेशानुसार मुख्य सचिव ने उक्त बोरवेल परमिट होल्डर द्वारा नियमों की अनदेखी पाते हुए परमिट को रद्द कर दिया था।