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Shimla News: आलू अनुसंधान संस्थान में हिंदी पखवाड़ा आरंभ
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ऑफिस के कार्यों में हिंदी के इस्तेमाल पर जोर
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। हिंदी दिवस पर केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला में सोमवार को हिंदी पखवाड़ा-2026 का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह, प्रधान वैज्ञानिक एवं संभागाध्यक्ष डॉ. आलोक कुमार, प्रशासनिक अधिकारी रजत सेठी और सहायक निदेशक राजभाषा मेधावी ने हिंदी के महत्व और कार्यों में इसके इस्तेमाल पर विचार रखे।
वक्ताओं ने कहा कि हिंदी को केवल राजभाषा दिवस या पखवाड़े तक सीमित रखने के बजाय इसे रोजमर्रा के काम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह ने हिंदी और संस्थान के इतिहास से जुड़े एक रोचक संयोग की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1949 हिंदी और केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान दोनों के लिए महत्वपूर्ण वर्ष रहा। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में सांविधानिक पहचान मिली और इसी वर्ष केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की स्थापना हुई। उन्होंने कहा कि यह महज संयोग नहीं, बल्कि दोनों की यात्रा को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ है।
सहायक निदेशक राजभाषा मेधावी ने कहा कि हिंदी का महत्व केवल सरकारी नियमों के अनुपालन तक सीमित नहीं है। किसी भाषा की असली ताकत तब सामने आती है, जब वह हमारे काम और व्यवहार में उतरती है। वैज्ञानिक शोध, नई तकनीक और कृषि संबंधी जानकारी जब सरल भाषा में किसानों तक पहुंचेगी तो उसका लाभ कहीं अधिक लोगों को मिलेगा। डॉ. आलोक कुमार और प्रशासनिक अधिकारी रजत सेठी ने कहा कि हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। भारत से बाहर भी लोग हिंदी को भारत और भारतीय समाज से जुड़ने के माध्यम के रूप में अपना रहे हैं। उन्होंने ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी की बढ़ती पहुंच का उल्लेख करते हुए कहा कि जब दूसरे देशों के लोग भारत से जुड़ने के लिए हिंदी सीख और अपना रहे हैं, तो हमें अपनी भाषा के इस्तेमाल को लेकर किसी तरह की झिझक नहीं होनी चाहिए।
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अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। हिंदी दिवस पर केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला में सोमवार को हिंदी पखवाड़ा-2026 का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह, प्रधान वैज्ञानिक एवं संभागाध्यक्ष डॉ. आलोक कुमार, प्रशासनिक अधिकारी रजत सेठी और सहायक निदेशक राजभाषा मेधावी ने हिंदी के महत्व और कार्यों में इसके इस्तेमाल पर विचार रखे।
वक्ताओं ने कहा कि हिंदी को केवल राजभाषा दिवस या पखवाड़े तक सीमित रखने के बजाय इसे रोजमर्रा के काम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह ने हिंदी और संस्थान के इतिहास से जुड़े एक रोचक संयोग की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1949 हिंदी और केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान दोनों के लिए महत्वपूर्ण वर्ष रहा। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में सांविधानिक पहचान मिली और इसी वर्ष केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की स्थापना हुई। उन्होंने कहा कि यह महज संयोग नहीं, बल्कि दोनों की यात्रा को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ है।
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सहायक निदेशक राजभाषा मेधावी ने कहा कि हिंदी का महत्व केवल सरकारी नियमों के अनुपालन तक सीमित नहीं है। किसी भाषा की असली ताकत तब सामने आती है, जब वह हमारे काम और व्यवहार में उतरती है। वैज्ञानिक शोध, नई तकनीक और कृषि संबंधी जानकारी जब सरल भाषा में किसानों तक पहुंचेगी तो उसका लाभ कहीं अधिक लोगों को मिलेगा। डॉ. आलोक कुमार और प्रशासनिक अधिकारी रजत सेठी ने कहा कि हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। भारत से बाहर भी लोग हिंदी को भारत और भारतीय समाज से जुड़ने के माध्यम के रूप में अपना रहे हैं। उन्होंने ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी की बढ़ती पहुंच का उल्लेख करते हुए कहा कि जब दूसरे देशों के लोग भारत से जुड़ने के लिए हिंदी सीख और अपना रहे हैं, तो हमें अपनी भाषा के इस्तेमाल को लेकर किसी तरह की झिझक नहीं होनी चाहिए।
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