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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Shimla News ›   Himachal: Ransingha, handmade carpets, and Himachal wood carving craft receive GI recognition.

हिमाचल: रणसिंघा, हस्तनिर्मित गलीचा और हिमाचल काष्ठ नक्काशी शिल्प को मिली जीआई मान्यता

Wed, 26 Aug 2026 07:49 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 26 Aug 2026 07:49 PM IST
सार

लोक भवन शिमला में आयोजित कार्यक्रम में राज्यपाल ने नाबार्ड समर्थित तीन पारंपरिक हिमाचली उत्पादों के प्रतिनिधियों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किए। 

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Himachal: Ransingha, handmade carpets, and Himachal wood carving craft receive GI recognition.
राज्यपाल ने तीन पारंपरिक हिमाचली उत्पादों के प्रतिनिधियों को जीआई पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किए। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक कला, शिल्प और सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिली है। बुधवार को लोक भवन शिमला में आयोजित कार्यक्रम में राज्यपाल ने नाबार्ड समर्थित तीन पारंपरिक हिमाचली उत्पादों के प्रतिनिधियों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किए। इस दौरान कारीगर समुदायों के योगदान को भी सम्मानित किया गया। जीआई प्रमाणपत्र पाने वाले उत्पादों में हिमाचल रणसिंघा (वाद्य यंत्र), हिमाचल हस्तनिर्मित गलीचा (कालीन) और हिमाचल काष्ठ नक्काशी शिल्प शामिल हैं। नाबार्ड के हिमाचल प्रदेश क्षेत्रीय कार्यालय ने इन उत्पादों के जीआई पंजीकरण को सुगम बनाने में सहयोग किया है। जीआई पंजीकरण से इन पारंपरिक उत्पादों की विशिष्ट पहचान और प्रामाणिकता को मजबूती मिलेगी। साथ ही, इनके बाजार विस्तार, ब्रांडिंग और व्यावसायिक संभावनाओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे इन शिल्पों से जुड़े कारीगरों के लिए आजीविका के नए अवसर भी सृजित हो सकेंगे।

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कार्यक्रम में नाबार्ड हिमाचल प्रदेश के मुख्य महाप्रबंधक डॉ. विवेक पठानिया ने कहा कि तीनों उत्पादों को जीआई मान्यता मिलना प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। नाबार्ड आगे भी उत्पादक समूहों और कारीगर समुदायों को मूल्य शृंखला विकास, ब्रांडिंग, बाजार संपर्क और क्षमता निर्माण के माध्यम से सहयोग प्रदान करेगा। इस अवसर पर नाबार्ड के उप महाप्रबंधक कुशल दीप, सहायक प्रबंधक हिमांशु बालियान समेत संबंधित कारीगर समुदायों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। कार्यक्रम में पारंपरिक शिल्प के संरक्षण और उनके व्यावसायिक विकास के लिए निरंतर प्रयास करने पर जोर दिया गया।
 

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