भूस्खलन की जद में देवभूमि का 80% इलाका, यहां कभी भी हो सकती है तबाही
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देवभूमि का 20 फीसदी क्षेत्रफल भूस्खलन को लेकर अत्याधिक संवेदनशील श्रेणी में है जबकि 60 फीसदी क्षेत्रफल हाई रिस्क जोन का हिस्सा है। शनिवार रात जिस भूस्खलन की जद में दो बसों सहित कुछ निजी वाहनों के आने से कई जानें चली गईं, वो भी संवेदनशील क्षेत्र में चिह्नित है। अध्ययनों से यह भी साफ है कि 76 फीसदी भूस्खलन मानसून में आते हैं।
इन तमाम जानकारियों के बावजूद संबंधित विभाग लगातार लापरवाही बरत रहे हैं। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) लगातार प्रदेश को लैंडस्लाइड जोन का चिन्हीकरण कर भेजता है, लेकिन भूस्खलन जोन से निपटने के तय फॉर्मेट पर संबंधित विभाग गंभीर नहीं हैं।
हिमाचल में भूस्खलन को लेकर इंजीनियर एंड एप्पलाइड साइंसेस रिसर्च की रिपोर्ट में संवेदनशील सड़क मार्गों में गुम्मा जोगिंद्रनगर धर्मशाला मार्ग, कालका शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच 22), शिमला रामपुर पियो सड़क मार्ग, मालिंग समडो का सड़क मार्ग, स्वारघाट बिलासपुर मंडी और औट का हिस्सा (एनएच 21), बिलासपुर शिमला हाईवे और डलहौजी चंबा क्षेत्र शामिल हैं।
जीएसआई की वर्ष 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक किन्नौर की सतलुज घाटी में 87 क्षेत्र, नैनादेवी मंदिर क्षेत्र, बिलासपुर और कीरतपुर सड़क मार्ग, शिमला शहर के तीन क्षेत्र, कुल्लू और मंडी जिले में 19 क्षेत्र, शिमला और कुल्लू में सतलुज नदी किनारे के 30 क्षेत्र, कालका शिमला रेलवे ट्रेक पर कई क्षेत्र, ब्यास नदी किनारे 173 क्षेत्र भूस्खलन के लिए संवेदनशील हैं।
बीते एक दशक में भूस्खलन के बढ़े मामलों का कारण पहाड़ों पर सड़क निर्माण और जलविद्युत परियोजना का तेजी से हुआ निर्माण इसका बड़ा कारण माना जा रहा है। सर्वाधिक भूस्खलन नव निर्मित सड़कों वाले क्षेत्रों में हो रहे हैं। इन क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने के लिए संबंधित विभाग भू्मि अध्ययन रिपोर्टों की अनदेखी कर रहे हैं।
यह करना जरूरी
- सक्रिय भूस्खलन क्षेत्रों का चिन्हीकरण, डिजिटल स्लोप मॉडल बनाना
- क्षेत्र में भूमि उपयोग का अलग मॉडल बनाना
- क्षेत्र में भूस्खलन से बचाव को लेकर जागरूकता अभियान और नियमित ड्रिल
- भूस्खलन प्रबंधन के लिए जिला स्तर पर कार्ययोजना
- क्षेत्र में होने वाले भू उपयोग पर नजर रखने के लिए तंत्र विकसित करना
प्रदेश में भूस्खलन की संवेदनशीलता
जिला अति संवेदनशील हाई रिस्क
मंडी 968 1978
बिलासपुर 216 842
चंबा 2120 3829
हमीरपुर - 851
कांगड़ा 123 3698
किन्नौर 868 4956
कुल्लू 1820 3512
लाहौल स्पीति 127 11637
शिमला 893 3345
सिरमौर 95 1805
सोलन 556 1118
ऊना 2 678
(आंकड़े वर्ग किलोमीटर में हैं।)
अब तक बड़े भूस्खलन
- कुमारसैन (1957), शिमला रामपुर मार्ग का साढ़े पांच किलोमीटर हिस्सा बहा
- मालिंग (1968) में एक किलोमीटर एनएच 22 क्षतिग्रस्त
- किन्नौर (दिसंबर 1982) शोडिंग नाला, 3 पुल और डेढ़ किलोमीटर रोड बहा
- झाखड़ी (मार्च 1989) नाथपा में 500 मीटर रोड बहा, आज भी सक्रिय
- लुग्गरभट्टी (सितंबर 1995), 65 लोग दबे, आधिकारिक 39 की मौत
- बसंतपुर (अक्तूबर 2004), मुलगी ब्रिज पर भूस्खलन से नौ मजदूर दबे, तीन घायल
- नेहरुकुंड (मार्च 2008), मनाली रोहतांग एनएच पर 6 लोग दबे, आठ घायल
बढ़ते मामले
वर्ष 1971 से 1979 तक 164 भूस्खलन
वर्ष 1980 से 1989 तक 62 भूस्खलन
वर्ष 1990 से 1999 तक 219 भूस्खलन
वर्ष 2000 से 2009 तक 474 भूस्खलन हुए