फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Shimla News ›   Himachal High Court Stern Observation Powers Granted for Emergency Situations Misused

हिमाचल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: आपात स्थिति के लिए मिलीं शक्तियों का किया गलत इस्तेमाल, ब्रेक की प्रथा शोषण

Sun, 26 Apr 2026 10:01 AM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 26 Apr 2026 10:01 AM IST
सार

सरकारी कर्मचारी भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम रद्द करते हुए हिमाचल हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। कहा कि सरकार ने आपातकालीन स्थितियों के लिए दी गई शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। 89 दिनों की नियुक्तियां देकर और फिर ब्रेक देकर दोबारा रखने की प्रथा को शोषणकारी करार दिया गया। पढ़ें पूरी खबर...

विज्ञापन
Himachal High Court Stern Observation Powers Granted for Emergency Situations Misused
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी (भर्ती एवं सेवा की शर्तें) अधिनियम, 2024 की सांविधानिकता को चुनौती दी गई थी। सरकारी कर्मी भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम रद्द करते हुए अदालत ने फैसले की शुरुआत में अपने आदेश में राज्य सरकार की 50 वर्षों पुरानी नियुक्ति नीतियों की कड़ी आलोचना की है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस साझा निर्णय में मुख्य रूप से नए अधिनियम की कानूनी वैधता की जांच की जा रही है।

विज्ञापन

अदालत ने पाया कि सरकार ने आपातकालीन स्थितियों के लिए दी गई शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। 89 दिनों की नियुक्तियां देकर और फिर ब्रेक देकर दोबारा रखने की प्रथा को शोषणकारी करार दिया गया। आदेश में कहा गया कि जब भी अदालतों ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया, सरकार ने उसका तोड़ निकालने के लिए नियुक्तियों के नाम बदल दिए, जैसे विद्या उपासक, पैरा-टीचर्स, पीटीए और पैट शिक्षक। कोर्ट ने दोहराया कि बिना भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के अनुबंध या अस्थायी आधार पर नियुक्तियां करना असांविधानिक है। 

विज्ञापन
विज्ञापन

कई मामलों में यह भी देखा गया कि चहेतों को पिछले दरवाजे से प्रवेश देने के लिए नियमों की अनदेखी की गई। हाईकोर्ट ने विभिन्न पुराने मामलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अनुबंध या अस्थायी कर्मचारियों को भी नियमित कर्मचारियों की तरह वेतन वृद्धि और पेंशन लाभ का अधिकार है। अनुबंध सेवा की अवधि को पेंशन के लिए गिना जाना चाहिए। सरकार को एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य करना चाहिए, न कि बेरोजगारों का शोषण करना चाहिए।  अदालत ने कहा कि यदि इस फैसले के बाद भी कर्मचारियों की कुछ शिकायतें शेष रहती हैं, तो वे नई याचिकाएं दायर करने के लिए स्वतंत्र होंगे। 

विज्ञापन

गौरतलब है कि इस अधिनियम को 7 फरवरी 2025 को राज्यपाल की मंजूरी मिली थी। इस कानून के माध्यम से सरकार ने स्पष्ट किया है कि अनुबंध के आधार पर की गई नियुक्तियां लोक सेवा का हिस्सा नहीं मानी जाएंगी। साथ ही अनुबंध अवधि की सेवा को वरिष्ठता या अन्य सेवा लाभों के लिए नहीं गिना जाएगा। सरकार का तर्क था कि यदि अनुबंध कर्मचारियों को नियुक्ति की पहली तिथि से वरिष्ठता दी गई, तो इससे पिछले 21 वर्षों की वरिष्ठता सूचियां बदलनी पड़ेंगी, जिससे कई नियमित कर्मचारी डिमोट हो सकते हैं और राजकोष पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत सरकार को सेवा नियम बनाने का पूरा अधिकार है। 

अनुबंध कर्मचारी अपनी नियुक्ति के समय शर्तों से वाकिफ थे और उन्होंने स्वेच्छा से अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि यह अधिनियम ताज मोहम्मद और लेख राम जैसे मामलों में दिए गए अदालती फैसलों को पलटने की एक कोशिश है, जिसमें अदालत ने अनुबंध सेवा को वरिष्ठता के लिए गिनने का आदेश दिया था। 

असांविधानिक कानून बना सदन की गरिमा गिरा रहे सीएम : जयराम
नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुक्खू सरकार के हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की भर्तियों की सेवा की शर्तें (विधेयक 2024) को असांविधानिक घोषित कर दिया है। पूर्व में हिमाचल के मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव की अगुवाई वाली खंडपीठ ने इसे खारिज किया था।

सरकार ने कर्मचारियों का हक छीनने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां भी उसे हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद सरकार ने सदन में असांविधानिक कानून लाकर विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री सुक्खू की ओर से सदन की गरिमा को गिराने का प्रयास किया गया, जिससे इन फैसलों से अगली सरकार की देनदारियों को टाला जा सके। मीडिया से बातचीत में जयराम ठाकुर ने कहा कि मुख्यमंत्री ने धर्मशाला के शीतकालीन सत्र-2024 में यह बिल फिर से पेश कर संख्या बल का फायदा उठाकर पास कराया। आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री और उनकी पूरी टीम खुद को कर्मचारी हितैषी बताती है, लेकिन असलियत में कर्मचारियों के साथ अन्याय किया गया। न्यायालय ने सरकार की इस कुटिलता को खारिज कर दिया।  इस तरह के असांविधानिक कानून का कोई औचित्य नहीं होता और इसके बावजूद अध्यक्ष सरकार का संरक्षण करते हैं। भाजपा ने बिल के खिलाफ विरोध जताया और सरकार को चेतावनी दी थी।

भाजपा का दावा सही साबित हुआ पहले ही दी थी चेतावनी : कटवाल
सरकारी कर्मचारी भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम-2024 को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायालय के फैसले के बाद नया मोड़ ले चुका है। हाईकोर्ट ने इस अधिनियम को खारिज कर दिया है, जिससे अनुबंध कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है, वहीं प्रदेश सरकार को बड़ा झटका लगा है।

झंडूता के विधायक जीतराम कटवाल ने कहा कि उन्होंने इस संवेदनशील विषय को विधानसभा में प्रमुखता से उठाया था। उन्होंने सरकार को आगाह करते हुए कहा था कि कर्मचारियों के अधिकारों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए और मनमाने निर्णय अदालत में चुनौती का कारण बन सकते हैं। विधायक ने सुप्रीम कोर्ट और महाराष्ट्र से जुड़े एक मामले का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया था कि किसी भी जूनियर कर्मचारी को सीनियर से अधिक लाभ नहीं दिया जा सकता। 

उन्होंने यह भी चेताया था कि इस तरह के प्रावधान न्यायिक चुनौती का सामना कर सकते हैं। कर्मचारियों के विरोध और आशंकाओं के बीच हाईकोर्ट की ओर से अधिनियम को खारिज किए जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि इस मुद्दे पर सरकार का निर्णय  न्यायिक कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया। इसके तहत दिसंबर 2003 या उसके बाद नियुक्त अनुबंध कर्मचारियों के लाभों को पूर्वव्यापी प्रभाव से सीमित कर दिया गया था। 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed