Himachal: हाईकोर्ट ने कहा- मुआवजे के लिए जमीन की किस्म या गुणवत्ता पर भेदभाव गलत
अदालत ने कहा कि यदि पूरी अधिग्रहीत भूमि का उपयोग एक ही उद्देश्य (सड़क) के लिए किया जा रहा है, तो उसे एक इकाई माना जाना चाहिए।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण के एक मामले में फैसला दिया है कि जब जमीन किसी सार्वजनिक उद्देश्य (जैसे सड़क निर्माण) के लिए अधिग्रहित की जाती है, तो मुआवजे के लिए जमीन की किस्म या गुणवत्ता के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने याचिकाकर्ताओं को 1313 रुपये प्रति सेंटारा की दर से बढ़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि यदि पूरी अधिग्रहीत भूमि का उपयोग एक ही उद्देश्य (सड़क) के लिए किया जा रहा है, तो उसे एक इकाई माना जाना चाहिए।
सरकार जमीन को बाखल या बगीचा जैसी श्रेणियों में बांटकर मुआवजे की दर कम नहीं कर सकती। अदालत ने प्रार्थियों की ओर से पेश किए गए एक सेल डीड को आधार माना, जिसमें पास के गांव की जमीन 1313 रुपये प्रति सेंटारे की दर से बिकी थी। हाईकोर्ट ने जिला अदालत की ओर से बिना किसी ठोस कारण के इस राशि को घटाकर 1000 रुपये करने के निर्णय को कानूनन गलत माना। हाईकोर्ट ने प्रार्थियों की अपील को स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि 1000 रुपये से बढ़ाकर 1313 रुपये प्रति सेंटारे कर दी है।
साथ ही प्रार्थियों को अतिरिक्त मुआवजा और ब्याज भी मिलेगा। दूसरी ओर प्रदेश सरकार द्वारा मुआवजे को कम करने के लिए दायर अपील को अदालत ने खारिज करते हुए कहा कि राज्य का यह दायित्व है कि वह भूमि मालिकों को उचित और न्यायसंगत मुआवजा प्रदान करे। यह मामला कोटखाई तहसील के मराथू-थरोला सड़क निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई भूमि से जुड़ा है। प्रार्थी और अन्य की जमीन का अधिग्रहण वर्ष 2010 में किया गया था। लैंड एक्विजिशन कलेक्टर द्वारा दिया गया मुआवजा कम होने के कारण प्रार्थी ने जिला अदालत (रेफरेंस कोर्ट) का दरवाजा खटखटाया था। जिला अदालत ने मुआवजे को बढ़ाकर 1000 रुपये प्रति सेंटारे तय किया था, जिसे चुनौती देते हुए दोनों पक्ष भू-स्वामी और सरकार हाईकोर्ट पहुंचे थे।