हिमाचल हाईकोर्ट के बड़े फैसले: नौकरी से बाहर रखने पर कर्मचारियों को मिलेगा पूरा वेतनमान, चार अपीलें खारिज
हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हक में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अगर विभाग की गलती या लंबी कानूनी लड़ाई की वजह से किसी सफल कर्मचारी को नौकरी पर वापस लेने में देरी की जाती है, तो उसे उस इंतजार की अवधि का पूरा वेतन पाना उसका कानूनी हक है। पढ़ें कोर्ट के बड़े फैसले
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हक में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अगर विभाग की गलती या लंबी कानूनी लड़ाई की वजह से किसी सफल कर्मचारी को नौकरी पर वापस लेने में देरी की जाती है, तो उसे उस इंतजार की अवधि का पूरा वेतन पाना उसका कानूनी हक है। भले ही इस दौरान कर्मचारी ने वास्तव में कोई काम न किया हो। खंडपीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब तक उच्च अदालतों से लेबर कोर्ट के आदेश पर कोई स्टे नहीं था, तब तक विभाग को कर्मचारी को काम पर रख लेना चाहिए था। विभाग अपनी ही विफलता और देरी का फायदा उठाकर कर्मचारी के वेतन का हक नहीं दबा सकता। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग डलहौजी की ओर से दायर चार अपीलों को खारिज करते हुए यह बड़ा फैसला दिया है।
यह है पूरा मामला
यह मामला दैनिक वेतन भोगी बेलदार अमर सिंह और उनके साथियों से जुड़ा है, जिन्हें साल 2000 में नौकरी से निकाल दिया गया। मई 2013 में लेबर कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें तुरंत बहाल करने का आदेश दिया। सरकार इस आदेश को मानने के बजाय पहले एकल जज, फिर खंडपीठ और अंत में सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती देती रही। इस टालमटोल के कारण कर्मचारी मई 2013 से नवंबर 2019 तक नौकरी से बाहर रहे। अब हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट के उस आदेश पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी और कहा कि कर्मचारी 2013 में ही जीत चुके थे और वह काम करने के लिए तैयार थे। उन्हें विभाग ने जबरन बेरोजगार रखा और ज्वाइनिंग नहीं दी, इसलिए नो वर्क नो पे का नियम यहां लागू नहीं होता।
दिव्यांग श्रेणी के टीजीटी के 94 पदों का परिणाम जल्द घोषित करने की तैयारी
प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में दिव्यांग श्रेणी के लिए आरक्षित प्रशिक्षित स्नातक शिक्षकों के पदों का परिणाम घोषित न करने पर कड़ा संज्ञान लिया था। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने 6 अक्तूबर को जारी आदेशों के अनुपालन में शिक्षा निदेशक (स्कूल शिक्षा) की ओर से 12 अक्तूबर 2026 को प्राप्त लिखित निर्देश कोर्ट के समक्ष पेश किए गए। सरकार की ओर से सूचित किया गया है कि काउंसलिंग और दस्तावेज सत्यापन के आधार पर मेरिट सूची तैयार की जा रही है और यह अंतिम रूप दिए जाने के कगार पर है। ब्लाइंड पर्सन एसोसिएशन की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से इस संबंध में जवाब तलब किया था। न्यायालय ने शिक्षा विभाग के इस लिखित आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को तय की है। अदालत ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग को आदेश दिए हैं कि आगामी सुनवाई पर इस भर्ती प्रक्रिया के संबंध में की गई ताजा प्रगति और अंतिम निर्णय की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए।
जमीन ली, न मुआवजा दिया न अधिग्रहण किया; हाईकोर्ट सख्त
प्रदेश हाईकोर्ट ने सड़क निर्माण के लिए बिना अधिग्रहण और बिना मुआवजा दिए नागरिक की निजी भूमि का उपयोग करने के मामले में राज्य सरकार को सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक सह-मालिक को अन्य सह-मालिकों की सहमति के बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है और म्यूटेशन में गलती के कारण किसी नागरिक का मालिकाना हक खत्म नहीं होता। न्यायाधीश संदीप शर्मा की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता बलि राम की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए प्रतिवादी राज्य सरकार सहित प्राधिकारी को दो महीने के भीतर भूमि का सीमांकन कर अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी करने और उचित मुआवजा प्रदान करने का आदेश दिया।अदालत ने कहा कि राज्य सरकार किसी नागरिक की भूमि का उपयोग बिना उचित मुआवजा दिए नहीं कर सकती और न ही देरी के आधार पर उसके अधिकार को छीना जा सकता है। याचिकाकर्ता बलि राम का आरोप था कि सिरमौर जिले की तहसील शिलाई में लानी से बोरड़ सड़क (4/900 से 4/945 किमी) के निर्माण के लिए उनकी भूमि (मोहाल बोरड़) का उपयोग वर्ष 2008 में किया गया था।
अधिग्रहण के समय याचिकाकर्ता वास्तव में भूमि के कानूनी सह-मालिक थे: कोर्ट
भूमि का उपयोग किए जाने के बावजूद, सरकार ने न तो इसके अधिग्रहण की कार्रवाई की और न ही उन्हें आज तक कोई मुआवजा दिया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि सड़क निर्माण के लिए याचिकाकर्ता की भूमि का उपयोग किया गया है। हालांकि, सरकार ने मुआवजे के दावे को खारिज किया। दलील दी गई कि सड़क निर्माण, अधिग्रहण के समय याचिकाकर्ता का नाम जमाबंदी में दर्ज नहीं था, बल्कि उनका नाम 2023 में दर्ज हुआ।याचिकाकर्ता के भाई (तुलसी राम) ने 15 जून 2007 को सड़क निर्माण के लिए एनओसी दिया था। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के एनओसी वाले तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्ता के भाई तुलसी राम एक सह-मालिक हैं, लेकिन उन्हें अन्य सह-मालिकों की ओर से एनओसी देने का कोई अधिकार नहीं था। वह केवल अपने हिस्से की भूमि के लिए सहमति दे सकते थे, अन्य सह-मालिकों के हिस्से के लिए नहीं।रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ता की मां का निधन 8 मई 2005 को हुआ था, जिसके बाद याचिकाकर्ता भी अन्य वारिसों के साथ संपत्ति के बराबर के हकदार बन गए थे। वर्ष 2009 के म्यूटेशन के दौरान पटवारी की चूक के कारण याचिकाकर्ता का नाम छूट गया था, जिसे बाद में संबंधित पटवारी की रिपोर्ट (18 मई 2026) द्वारा स्पष्ट कर दिया गया। न्यायालय ने माना कि अधिग्रहण के समय याचिकाकर्ता वास्तव में भूमि के कानूनी सह-मालिक थे।
टेंडर के लिए गाड़ी का मालिक होना जरूरी, युवाओं की याचिका खारिज
प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की डोर-स्टेप डिलीवरी पॉलिसी में किए गए नए बदलावों को वैध ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि डिपो तक राशन पहुंचाने के सरकारी टेंडर में शामिल होने के लिए आवेदक या उसके परिवार के नाम पर मालवाहक वाहनों (गाड़ियों) का होना एक अनिवार्य योग्यता है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने बेरोजगार शिक्षित युवाओं (दीपक कुमार और अन्य) की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे शिक्षित बेरोजगार हैं और पिछले कई वर्षों से दूसरों की गाड़ियां किराए पर लेकर सरकारी राशन की ढुलाई का काम संतोषजनक ढंग से कर रहे थे।लेकिन सरकार ने 28 जुलाई 2026 को नीति में संशोधन कर यह शर्त लगा दी कि टेंडर भरने वाले के पास खुद की या उसके परिवार (पत्नी, बेटे, बहू, अविवाहित बेटी) के नाम पर गाड़ियां पंजीकृत होनी चाहिए। युवाओं का कहना था कि यह शर्त उनके व्यापार करने के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 19 और समानता के अधिकार अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है और बाजार में कुछ अमीर गाड़ी मालिकों का एकाधिकार पैदा करती है। सरकार ने कोर्ट को बताया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 में राशन को हर महीने की पहली तारीख या पहले हफ्ते तक उचित मूल्य की दुकानों (डिपो) तक पहुंचाना अनिवार्य है। पहले कई बार ऐसा देखा गया कि सफल टेंडर ठेकेदारों के पास अपनी खुद की गाड़ियां न होने के कारण वे समय पर राशन नहीं पहुंचा पाते थे और आपातकालीन परिस्थितियों में दूसरों की गाड़ियों पर निर्भर रहने से राशन वितरण में देरी होती थी। जनता के व्यापक हित में राशन की सुचारू सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए यह नीतिगत बदलाव किया गया है।