हिमाचल के स्कूल प्रबंधनों की लापरवाही, खर्च नहीं पाए करोड़ों रुपये
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हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में वर्ष 2009 से पहले विद्यार्थियों से संचायिका सहित बिल्डिंग, स्पोर्ट्स, मैगजीन और रेडक्रॉस के नाम पर जुटाए गए करोड़ों रुपये स्कूल प्रबंधनों की लापरवाही से खर्च ही नहीं हो पाए हैं। यहां तक कि कई स्कूलों ने संचायिका राशि तक बच्चों को नहीं लौटाई है। अब यह राशि शिक्षा निदेशालय के खाते में जमा करवाई जाएगी।
साल 2009 में आरटीई एक्ट लागू होने से पहले स्कूली बच्चों से संचायिका सहित कई तरह के फंड एकत्रित किए जाते थे। हालांकि, संचायिका की राशि पास आउट बच्चों को लौटा दी जाती थी लेकिन, कुछेक स्कूल ऐसे भी हैं जहां पर बच्चों ने अपनी संचायिका राशि नहीं ली है। बैंकों में जमा करोड़ों की यह राशि ब्याज जोड़कर अब कई गुना बढ़ गई है, जिसे शिक्षा निदेशालय के खाते में जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं।
आरटीई एक्ट के बाद फंड लेने पर लगी रोक
प्रारंभिक शिक्षा निदेशक मनमोहन शर्मा ने बताया कि शिक्षा विभाग की मुहिम के तहत फंड (अनस्पेंड अमाउंट) राशि एकत्रित की जा रही है। पूरे प्रदेश के स्कूलों से यह राशि 20 करोड़ से अधिक हो सकती है। शिक्षा उपनिदेशकों को इस बारे में पहले ही निर्देश दिए जा चुके हैं।
सरकारी स्कूलों में पहली से आठवीं कक्षा के छात्रों से कई तरह से फंडों की वसूली की जाती थी। स्कूल के पास सारे फंड की राशि एकत्रित होने के बाद इसे समय समय पर बैंकों में जमा कर दिया जाता था।
प्रदेश में 2009 में आरटीई (राइट टू एजुकेशन) एक्ट आने के बाद फंड वसूली पर रोक लग गई। यह सारे फंड 2009 से पहले के ही हैं। 2009 से पहले कई सालों से फंड के नाम पर वसूली होती रही। लेकिन, फंड को खर्च ही नहीं किया गया।