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हिमाचल: पर्यावरणविद् बोले- भूक्षरण को प्राकृतिक आपदा कहना, सच्चाई से मुंह मोड़ना
Fri, 13 Aug 2021 11:47 AM IST
Krishan Singh
अमर उजाला नेटवर्क, गोहर (मंडी)
अमर उजाला नेटवर्क, गोहर (मंडी)
Published by: Krishan Singh
Updated Fri, 13 Aug 2021 11:47 AM IST
सार
आधुनिक विकास की अवधारणा और पर्यावरण संरक्षण में टकराव का रिश्ता है या यूं कहें दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है। विकास की नई ऊंचाइयों को छूने और स्वस्थ जीवन के लिए समाज को दोनों की ही जरूरत रहती आई है।
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विजय विशाल, साहित्यकार एवं पर्यावरणविद्
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों किन्नौर, मंडी, सिरमौर, चंबा और लाहौल स्पीति में बार-बार होने वाले भूक्षरण को प्राकृतिक आपदा कहना, सच्चाई से मुंह मोड़ना है। दरअसल इन हादसों में होने वाली मौतें आधुनिक विकास के नाम पर दी जाने वाली किसी नर बलि से कम नहीं हैं। आधुनिक विकास की अवधारणा और पर्यावरण संरक्षण में टकराव का रिश्ता है या यूं कहें दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है।
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विकास की नई ऊंचाइयों को छूने और स्वस्थ जीवन के लिए समाज को दोनों की ही जरूरत रहती आई है। नई परियोजनाएं जहां समाज को आगे ले जाने में अपनी भूमिका निभाती हैं, वहीं रोजगार के नए अवसर भी पैदा करती हैं। मगर इन परियोजनाओं से पहाड़ों, जंगलों और नदियों को जो नुकसान होता है वह मनुष्य के अस्तित्व को ही चुनौती देने लगता है। आज प्रदेश के सामने ऐसी ही परिस्थितियां खड़ी हो गई हैं।
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प्रदेश में विकास के नाम पर बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं। इनमें नए नेशनल हाईवे का निर्माण, पुराने नेशनल हाईवे को चौड़ा कर फोरलेन मार्ग में तबदील करना तथा नदियों के तटों पर बड़ी पन बिजली योजनाओं का निर्माण करना शामिल है। पिछले कुछ वर्षों से पहाड़ों में बार-बार होने वाली भूक्षरण की घटनाओं के बाद अनेक अध्ययनों में यह बात सामने आई थी कि बिजली परियोजनाओं के नाम पर वहां पहाड़ों के भीतर सुरंगें खोदकर उन्हें पूर्णत: खोखला किया जा चुका था।
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जिससे ये आपदाएं बढ़ गई हैं। पूरे परिदृश्य को देखकर तो कई बार ऐसे लगता है कि जैसे देश के दूसरे राज्यों की तरह इस पहाड़ी प्रदेश में भी खनन माफिया व बड़े ठेकेदार विकास परियोजनाओं पर कब्जा जमाए बैठे हैं। वे ही अपने मनमाफिक विकास योजनाएं सरकार से बनवा रहे हैं, उन्हें पास करवा रहे हैं और फिर कार्यान्वित भी कर रहे हैं। इनके नतीजे आपके सामने हैं। -विजय विशाल, साहित्यकार एवं पर्यावरणविद्