हिमाचल में राम राज, एक क्लिक में जानिए सीएम जयराम का राजनीतिक करियर
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पांचवीं बार चुनकर विधानसभा पहुंचे जयराम ठाकुर की संगठन में भी उतनी ही अच्छी पकड़ है, जितनी पार्टी में। 1965 में जन्में जयराम का जीवन संघर्ष और चुनौती भरा रहा।
घरेलू परिस्थितियां पक्ष में न होने के बावजूद उन्होंने बमुश्किल हाई स्कूल किया और कॉलेज में दाखिला लिया।
1998 में वह पहली बार चच्योट विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए, जो सिलसिला 2017 तक भी उन्होंने बरकरार रखा।
कैसे परवान चढ़ा राजनीतिक सफर
- 1984 में एबीवीपी से छात्र राजनीति में आए और कला संकाय में पढ़कर कक्षा प्रतिनिधि का पद जीता।
- 1986 में एबीवीपी की प्रदेश इकाई में संयुक्त सचिव बने।
- 1989 से 1993 तक एबीवीपी की जम्मू-कश्मीर इकाई में संगठन सचिव रहे। यहां से संगठन में इन्हें काफी अच्छी पकड़ मिली।
- 1993 से 1995 तक भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के प्रदेश सचिव और प्रदेश अध्यक्ष भी रहे।
- 1998 में जयराम पहली बार विधायक बने।
- 2000 से 2003 तक वह मंडी जिला भाजपा अध्यक्ष रहे। 2003 में फिर चुनाव जीते।
- 2003 से 2005 तक भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे।
- 2006 में उन्हें प्रदेशाध्यक्ष का पद मिला।
- 2007 में चुनाव जीतकर पंचायतीराज मंत्री बने।
- 2012 में वह फिर सिराज से जीते।
1993 में घरवालों ने किया था विरोध और हारे थे
ग्राम पंचायत मूराहग के तांदी गांव में 6 जनवरी, 1965 को जेठूराम और ब्रिकमू देवी के घर जन्में जयराम ठाकुर का बचपन गरीबी में कटा। परिवार में 3 भाई और 2 बहनें हैं। पिता खेतीबाड़ी और मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण करते थे। जयराम तीन भाइयों में सबसे छोटे हैं। इसलिए उनकी पढ़ाई-लिखाई में परिवार वालों ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
जयराम की मां बिक्रमू देवी कहती हैं कि उन्हें आज भी याद है कि जयराम के राजनीति में जाने को लेकर कोई खुश नहीं था। घर परिवार से दूर जम्मू-कश्मीर जाकर एबीवीपी का प्रचार किया। जब 1992 में घर लौटे तो वर्ष 1993 में जयराम ठाकुर को भाजपा ने सिराज विधानसभा क्षेत्र से टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार दिया।
घरवालों को इसका पता चला तो उन्होंने विरोध किया। जयराम ठाकुर के बड़े भाई बीरी सिंह बताते हैं कि परिवार के सदस्यों ने जयराम ठाकुर को राजनीति में न जाकर खेतीबाड़ी संभालने की सलाह दी थी। चुनाव लड़ने के लिए परिवार की आर्थिक स्थिति इजाजत नहीं दे रही थी।
जयराम ने अपने दम पर राजनीति में डटे रहने का निर्णय लिया और विधानसभा चुनाव लड़ा। उस वक्त जयराम ठाकुर मात्र 26 वर्ष के थे। वे यह चुनाव हार गए। वर्ष 1998 में भाजपा ने फिर जयराम को चुनावी रण में उतारा। इस बार इन्होंने जीत हासिल की। उसके बाद विधानसभा चुनाव में कभी हार का मुंह नहीं देखा।
अध्यापक बोले- शाबाश मेरे होनहार
जयराम ठाकुर को पढ़ा चुके अध्यापक लालू राम बताते हैं कि जयराम ठाकुर बचपन से ही पढ़ाई में काफी तेज थे। अध्यापक भी यही सोचते थे वह किसी अच्छी पोस्ट पर जरूर जाएंगे, लेकिन यह मालूम नहीं था कि उनका शिष्य प्रदेश की राजनीति का चमकता सितारा बन जाएगा और प्रदेश में सत्ता की कमान संभालेगा।
कब कौन बना मुख्यमंत्री
1952- यशवंत परमार पहले मुख्यमंत्री बने
1963 - यशवंत परमार को फिर मिली बागडोर
1977 - रामलाल ठाकुर बने मुख्यमंत्री
1980 - रामलाल ठाकुर दूसरी बार बने सीएम
1983 - वीरभद्र सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने
1985 - कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह को फिर चुना सीएम
1990 - शांता कुमार तीन वर्ष के लिए मुख्यमंत्री बने
1993 - वीरभद्र सिंह फिर मुख्यमंत्री बने
1998 - पहली बार प्रदेश के सीएम बने प्रेम कुमार धूमल
2003 - सत्ता परिवर्तन पर वीरभद्र सीएम बने
2007 - प्रेम कुमार धूमल को दूसरी बार सीएम की कुर्सी
2012 - सत्ता में लौटी कांग्रेस ने वीरभद्र को सीएम बनाया