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अमर उजाला बजट विश्लेषण: घोषणाएं लुभावनी पर कर्ज के पहाड़ का रिवाज कायम रखना भी मजबूरी

Sat, 18 Mar 2023 11:22 AM IST
Krishan Singh राकेश भट्ट, शिमला
राकेश भट्ट, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Sat, 18 Mar 2023 11:22 AM IST
सार

मुख्यमंत्री ने लुभावनी घोषणाएं तो बहुत कीं लेकिन पैसा कहां से आएगा, इसकी योजना को लेकर कुछ ठोस नहीं बोला। ऐसे में सभी बजट घोषणाएं धन की व्यवस्था कर साल भर में पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगा। 

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Himachal budget 2023: Announcements are tempting but it is also compulsion to maintain the custom of mountain
हिमाचल बजट 2023 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 भले ही सरकार बदलने का रिवाज देवभूमि हिमाचल में कायम रहा हो लेकिन प्रति वर्ष कर्ज का बोझ बढ़ाकर घी पीने का रिवाज कायम रखने की तस्वीर कांग्रेस की सुखविंद्र सिंह सुक्खू सरकार के 2023-24 के पहले बजट में भी दिखी है। अनुमान है कि इस वर्ष कर्ज का यह पहाड़ और बड़ा हो जाएगा। मुख्यमंत्री ने लुभावनी घोषणाएं तो बहुत कीं लेकिन पैसा कहां से आएगा, इसकी योजना को लेकर कुछ ठोस नहीं बोला।  ऐसे में सभी बजट घोषणाएं धन की व्यवस्था कर साल भर में पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगा। विरासत में मिले ऋण को लेकर पक्ष-विपक्ष में आरोप-प्रत्यारोप का दौर रोज चलता है।

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कांग्रेस की सरकार सत्ता में आने के बाद से भारी भरकम कर्ज छोड़कर जाने पर विपक्ष पर लगातार हमलावर है तो भाजपा इसे पूर्व की कांग्रेस सरकारों के समय से चली आ रही परंपरा बता रही है। बहरहाल, तीन माह में ही वर्तमान सरकार करीब 3,500 करोड़ रुपये का कर्ज ले भी चुकी है। सुक्खू सरकार के बजट 2023-24 में प्रति 100 रुपये में से वेतन पर 26 रुपये, पेंशन पर 16 रुपये, ब्याज अदायगी पर 10 रुपये व ऋण अदायगी पर 10 रुपये खर्च का अनुमान रखा गया है। यानी 100 रुपये में 62 रुपये वेतन, पेंशन व ऋण पर ही खर्च होंगे।
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वित्तीय प्रबंधन कहें या आंकड़ों की कलाकारी
पिछली भाजपा की जयराम सरकार के अंतिम बजट पर नजर डालें तो प्रति 100 रुपये में से इन चार मदों में ही 62 रुपये खर्च का अनुमान बताया गया था। इसे वित्तीय प्रबंधन कहें या आंकड़ों की कलाकारी लेकिन गत वित्तीय वर्ष में करीब 75 हजार करोड़ कर्ज पर ऋण अदायगी प्रति 100 रुपये पर 11 रुपये अनुमानित थी तो इस वित्तीय वर्ष में 85 हजार करोड़ रुपये तक के अनुमानित कर्ज होने पर अदायगी प्रति 100 रुपये पर 10 रुपये रहने का अनुमान बताया गया है। हालांकि, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष 1.10 लाख रोजगार इस वित्तीय वर्ष में देने, महिलाओं को 1,500-1,500 रुपये व ओपीएस की पेंशन देने सहित इस बजट में विकास कार्यों सहित लुभावनी घोषणाएं के बीच उतनी ही खर्च राशि इन चार मदों में कैसे मैनेज रहेगी, यह वित्तीय प्रबंधन आने वाले समय में देखना होगा। 

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बजट में आय बढ़ाने की बात
सुक्खू ने नई आबकारी नीति, पावर प्लांटों पर सेस अन्य माध्यमों से आय बढ़ाने की बात तो कही है लेकिन सरकार में राजस्व प्राप्ति गत वर्ष के मुकाबले करीब 1,624 करोड़ रुपये व व्यय 2,426 करोड़ रुपये बढ़ने का ही अनुमान है। दूसरी ओर वित्तीय संकट का हवाला देकर कड़े फैसले लेने के सुक्खू के बयानों से उम्मीद थी कि बजट में कुछ नए कर या आय के स्रोत बढ़ाने की घोषणा हो सकती है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 


चालू वित्तीय वर्ष में 9,900 करोड़ रुपये राजकोषीय घाटा बताया गया है जिसके लिए कम से कम इतनी राशि का ऋण लेना होगा, यह पिछले बजट के राजकोषीय घाटे से 298 करोड़ रुपये अधिक है। वैसे हिमाचल में सरकारों का कर्ज लेने की कोई नई मजबूरी नहीं है। अभी तक के मुख्यमंत्रियों में से शांता कुमार व प्रेम कुमार धूमल ने खर्च कम करके काफी हद तक कर्ज कम करने का प्रयास किया था। 

पिछली तीन सरकारों के ऋण लेने के आंकड़े देखें तो वर्ष 2011-12 में भाजपा की धूमल सरकार ने 26,684 करोड़ रुपये का ऋण छोड़ा था। इसके बाद कांग्रेस की वीरभद्र सरकार ने 2016-17 में 44,422 करोड़ का ऋण छोड़ा तो गत वर्ष भाजपा की जयराम सरकार ने करीब 75 हजार करोड़ रुपये का ऋण छोड़ा। भाजपा की जयराम सरकार के कार्यकाल में ऋण का बोझ सबसे ज्यादा बढ़ा लेकिन यह सच है कि कांग्रेस व भाजपा सरकार की नैय्या ऋण के बिना आगे नहीं बढ़ सकी।

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