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सत्ता के दुर्ग कांगड़ा की किलेबंदी करने में जुटी भाजपा और कांग्रेस

Wed, 25 Oct 2017 12:37 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Wed, 25 Oct 2017 12:37 PM IST
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himachal assembly election 2017 kangra district side story

प्रदेश में सर्वाधिक विधानसभा सीटों वाले कांगड़ा जिले का मैदान मारने के लिए भाजपा-कांग्रेस अपनी-अपनी किलेबंदी करने में जुट गए हैं। दोनों दलों के सियासी रणनीतिकार जानते हैं कि 15 विधानसभा सीटों वाला कांगड़ा लोअर हिमाचल का सियासी दुर्ग है। शिमला में सरकार बनाने का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।

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यहां भाजपा की बड़ी चिंता तीन अहम सीटों पर बगावत को लेकर है, जबकि कांग्रेस के लिए बागियों से अधिक जिले के क्षत्रपों को एकसाथ रखने की चुनौती है। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने यहां से 10 सीटें जीती थीं जबकि भाजपा तीन विधानसभा हलकों में विजय पताका फहराने में कामयाब रही थी।
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दोनों ही दलों के चुनावी टारगेट चूंकि कांगड़ा जिले पर निर्भर हैं, ऐसे में कांग्रेस ने मिशन रिपीट तो भाजपा ने मिशन 50 प्लस की सफलता के लिए जिला कांगड़ा से ही चुनाव प्रचार अभियान का आगाज किया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दो बार जिले का दौरा कर चुके हैं। पालमपुर में दो दिवसीय चुनावी मंथन के बाद कांगड़ा में शाह ने रैली कर साफ कर दिया है कि जीत हार में जिला बेहद महत्वपूर्ण है। 

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बगावत से जूझ रही है भाजपा

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राष्ट्रीय महामंत्री संगठन रामलाल - फोटो : File Photo

भाजपा वर्ष 2012 से सबक लेकर हर कदम फूंक-फूंक कर उठा रही है। पिछले चुनाव में हार की बड़ी वजह टिकटों के गलत चयन को मानते हुए इस मर्तबा नए चेहरे देकर गलती सुधारने की कोशिश की गई है। शांता और धूमल खेमे की खींचतान को कम करने के लिए इस बार केंद्रीय नेतृत्व ने अपने हिसाब से हलकों के प्रत्याशी तय किए।

यह अलग बात है कि प्रत्याशी चयन में खेमों की अनदेखी से कई सीटों में बगावत की चिंगारी फूट पड़ी। नामांकन के आखिरी दिन तक डैमेज कंट्रोल की तमाम कोशिशों के बावजूद फतेहपुर में बलदेव सिंह, पालमुपर में प्रवीण शर्मा और संसदीय क्षेत्र की सीट चंबा में बगावत शांत नहीं हुई।

नूरपुर, इंदौरा, कांगड़ा और ज्वाली में बागियों को मना लिया गया, लेकिन भितरघात की आशंका बरकरार है। पार्टी ने बगावत और भितरघात पर नियंत्रण पाने के लिए दूसरे राज्यों से आए पार्टी पर्यवेक्षक और संघ को जिम्मेदारी सौंपी है, जबकि राष्ट्रीय महामंत्री संगठन रामलाल और प्रदेश प्रभारी मंगल पांडेय स्थानीय नेताओं की मदद से निगरानी रखे हुए हैं। 24 घंटों में पार्टी पर बागियों से नामांकन वापस दिलाने का दबाव है।

कांग्रेस में बगावत नहीं भितरघात की चिंता

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कांग्रेस के लिए कांगड़ा में आंतरिक कलह सबसे बड़ी चिंता है। जिले में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में बागियों की कम संख्या पार्टी के रणनीतिकारों को राहत दे सकती है। लेकिन पार्टी के लिए वर्ष 2012 जीती 10 सीटों को बचाए रखने की चुनौती बढ़ गई है। आचार संहिता से पहले पार्टी के प्रचार कार्यक्रम में वीरभद्र और सुक्खू के बीच की खींचतान के चलते समन्वय नहीं बन पाया, लेकिन नए प्रदेश प्रभारी सुशील कुमार शिंदे ने कांगड़ा पर फोकस किया।

वीरभद्र अपने स्तर पर जिले में सक्रिय रहे। पार्टी में कांगड़ा से टिकट तय करने के लिए भाजपा के मुकाबले कांग्रेस मे कलह कम रही। जिले के 10 सिटिंग विधायकों से आठ को रिपीट किया गया, जबकि दो नीरज भारती की जगह उनके पिता चंद्र कुमार और बीबीएल बुटेल की जगह उनके बेटे आशीष को टिकट दिया गया।

सांसद विप्लव ठाकुर को देहरा से उतार कर पार्टी ने नया प्रयोग किया है। निर्दलीय पवन काजल को कांगड़ा से उतारने से विरोध हुआ। इसके अलावा शाहपुर से पर्यटन बोर्ड के उपाध्यक्ष मेजर विजय सिंह मनकोटिया (रि) ने निर्दलीय पर्चा भरके पार्टी की मुसीबतें बढ़ाई हैं। यहां पार्टी के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती वीरभद्र विरोधी कैंप को साधने की है।

शाहपुर में मनकोटिया फैक्टर तो पालमपुर में बुटेल परिवार की खींचतान को नियंत्रित करना आसान नहीं रहेगा। इंदौरा में सिटिंग विधायक निर्दलीय मनोहर धीमान का क्या रुख रहता है, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। भितरघात की आशंका पर विराम लगाने के लिए पार्टी ने अन्य राज्यों से कई दिग्गजों को जिम्मेदारी सौंप दी है।

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