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प्रदेश में बढ़ने लगे काला मोतिया के मरीज

Fri, 11 Mar 2022 11:46 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 11 Mar 2022 11:46 PM IST
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Gulcoma patient increase in hp
आईजीएमसी की आंखों की ओपीडी में सौ में दस मरीज आ रहे काला मोतिया के
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आंखों की रोशनी घटने पर करवाएं चेक : डॉ. रामलाल
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल में काला मोतिया (ग्लूकोमा) के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (आईजीएमसी) में आंखों की ओपीडी में इलाज के लिए आने वाले मरीजों की जांच में यह खुलासा हुआ है।
आईजीएमसी के नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. रामलाल शर्मा ने बताया कि ओपीडी में आने वाले मरीजों में से दस फीसदी मरीज काला मोतिया से ग्रसित पाए जा रहे हैं। यह जानकारी उन्होंने शुक्रवार को आईजीएमसी के नेत्ररोग विभाग में ग्लूकोमा जागरूक दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में दी। इससे पूर्व डॉक्टरों ने मुख्य गेट से लेकर रिज मैदान तक जागरूकता रैली भी निकाली। यह बीमारी आंखों की रोशनी को धीरे-धीरे कम करती है, इलाज न करवाएं तो व्यक्ति अंधा हो जाता है। आईजीएमसी के नेत्ररोग विभाग की चिकित्सक डॉ. उज्जवला चौहान और डॉ. विनोद शर्मा ने बताया कि 40 से 50 साल की उम्र में नजदीक की रोशनी धीरे-धीरे कम होना शुरू हो जाती है। इसलिए इस उम्र के लोग अपना रुटीन में अस्पताल आकर अपनी जांच करवाए। इससे ग्लूकोमा जैसी बीमारी से समय रहते बचा जा सके।
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दवाई और लेजर तकनीक से इलाज संभव
काला मोतिया होने पर आंखों की रोशनी धीरे-धीरे कम होना शुरू हो जाती है। ऐसे लक्षण नजर आएं तो तुरंत अस्पताल आकर इसकी जांच करवानी चाहिए। अस्पतालों में दवाइयां, लेजर तकनीक के अलावा ऑपरेशन से इसका समय रहते इलाज संभव है। सफेद मोतिया, कार्निल और रेटीन संबंधी बीमारी है तो इससे घबराने की जरूरत नहीं है। इसका इलाज पूरी तरह संभव हैं।
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लक्षण और बचाव के तरीके
काला मोतिया होने पर मरीजों को पहले धुंधला दिखता है। कुछ लोगों को सिरदर्द भी होता है। मरीज के चश्मे का नंबर भी बार-बार बदलना पड़ता है। लाइट रंगीन दिखनी शुरू हो जाती है। चिकित्सकों का कहना है इस बीमारी से बचाव के लिए मरीजों को साल में एक बार आंखों की जांच और प्रेशर चेक करवाना चाहिए। परिवार में किसी को यह बीमारी है तो परिवार के बाकी सदस्यों को भी इसकी जांच करवानी चाहिए।

ऐसे होती है बीमारी
काला मोतिया होने पर मरीज की आंख के अंदर एक तरल पदार्थ पैदा होता है। यह तरल पदार्थ आंख के महीन छिद्रों (फिल्टर) से बाहर निकलते हैं। उम्र के साथ छिद्र तंग हो जाते हैं, इस कारण तरल पदार्थ के निकलने की प्रक्रिया बाधित होती है। इससे आंख पर प्रेशर बढ़ने लगता है। आंख का बढ़ा प्रेशर ऑप्टिक नर्व (आंखों से दिमाग को सिग्नल भेजने वाला रेशे) को डैमेज करता है। आमतौर पर ऐसा आंखों पर ज्यादा जोर पड़ने से होता है। ज्यादा प्रेशर पड़ने पर यह ब्लॉक हो जाती है और दिखना बंद हो जाता है।
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