{"_id":"f20311d9ec48d06731d16f092aeb9d5f","slug":"gorkha-rifle-foundation-day-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"आज का दिन है इनके लिए खास, पढ़ें इतिहास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आज का दिन है इनके लिए खास, पढ़ें इतिहास
जोगेंद्र कुमार/अमर उजाला, सुबाथू (सोलन)
Updated Thu, 01 Jan 2015 01:03 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश की पैदल सेना प्रथम गोरखा राइफल 200 साल की हो गई है। कम लोग यह जानते हैं कि देश के लिए अनगिनत कुर्बानियां देने वाली गोरखा राइफल की स्थापना 1815 में सुबाथू में हुई। इससे पहले गोरखा बिलासपुर के मलौन किले को लेकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया से भिड़े। गोरखा खुखरी से लड़े और अंग्रेज तोपों से।
विज्ञापन
इस जंग में अंग्रेज विजयी हुए, लेकिन गोरखा टुकड़ी के साहस के आगे वह नतमस्तक हो गए और गोरखा राइफल का गठन किया। गोरखा राइफल को (मलौन रेजिमेंट) का नाम दिया गया। यह सुनहरा अध्याय गोरखा रेजिमेंट के सैन्य इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज है।
विज्ञापन
1815 से लेकर 2015 तक प्रथम गोरखा राइफल पैदल सेना के जवान वतन के लिए अपनी कुर्बानी देते आए हैं। 200 साल बाद आज भी वाहिनी देश की रक्षा के लिए उसी जज्बे के साथ तैनात है। प्रथम गोरखा राइफल की पांच वाहिनियां हैं। जिसका मुख्य केंद्र जिला सोलन के सुबाथू में 14 गोरखा प्रशिक्षण केंद्र है।
विज्ञापन
गौरवमयी इतिहास- वाहिनी ने जाट युद्ध के दौरान बेटल पदक, दूसरे अफगान युद्ध के दौरान थियेटर पदक हासिल किया। 1944 में गोरखा अर्बन टैंकों के साथ इंफाल और कोहिमा पहुंचे। जहां जापान और ब्रिटिश सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में वाहिनी ने ब्रिटिश सेना के साथ मिलकर कोहिमा पर विजय प्राप्त की। वहीं, 3 मई 1945 में बर्मा की राजधानी रंगून पर भी जीत हासिल की।
करीब 6 साल की इस लड़ाई के बाद आखिर जापान ने गोरखा सेना के आगे हाथ खड़े कर दिए। 1947 में आजादी के बाद भारत, नेपाल और इंग्लैंड के बीच तीन देशीय समझौता हुआ। जिसमें गोरखा वाहिनी का चार हिस्सा ब्रिटिश सेना को दिया गया और छोटा हिस्सा भारत को मिला। जिसके बाद प्रथम गोरखा राइफल को भारतीय सेना में शामिल किया गया।
कायर होने से बेहतर है मरना- सुबाथू सेना अध्यक्ष ब्रिगेडियर ओपी सिंह (सेना मेडल) ने बताया कि 1815 में इस सेना का गठन किया। रेजिमेंट 200 साल की हो चुकी है। युद्ध भूमि पर अपने हथियार खुखरी से दुश्मनों को ढेर करने वाले हर गोरखा सैनिक का एक ही लक्ष्य होता है कि (कायर हुनू भंदा मरनो राम्रो) कायर होने से मरना बेहतर है।
साहस को भारत ने किया है सलाम-तृतीय गोरखा वाहिनी के कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया ने गोरखा सैनिकों के लक्ष्य को कांगू युद्ध में सच साबित किया है। कैप्टन सलारिया ने कांगू युद्ध में अकेले ही 61 दुश्मनों को खुखरी से मौत के घाट उतारा और अंत में वीरगति को प्राप्त हो गए।
उनकी बहादुरी पर भारतीय सेना का सबसे ऊंचा पदक परमवीर चक्र कै. सलारिया के नाम के साथ जुड़ा। गोरखा वाहिनी ने अपनी बहादुरी का परिचय देकर 2 विक्टोरिया, 1 परमवीर चक्र, 7 महावीर चक्र, 16 वीर चक्र, 1 क्रीति चक्र, 3 शौर्य चक्र, 1 युद्ध सेवा मेडल और 22 सेना मेडल हासिल किए हैं।