ताबूत से लिपट फूट-फूट कर रोए परिवार, चेहरा न देख पाने का मलाल
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इराक के मोसुल से घर पहुंचे चार युवकों के ताबूत में बंद अवशेषों से परिवार के सदस्य लिपटकर फूट-फूटकर रोए। जैसे ही अवशेष घर पहुंचे परिवार के लोग अचेत होकर गिर गए।
पांच साल के इंतजार के बाद चारों युवकों को करीब आधे घंटे तक घर का आंगन नसीब हुआ। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया। घर से लेकर शमशानघाट तक रोने-चिल्लाने की आवाजें ही सुनाई दे रही थीं।
हजारों लोगों ने नम आंखों से विदाई दी। परिजनों को इस बात का मलाल रहा कि वे अपने लाडलों का चेहरा तक नहीं देख पाए। धमेटा के संदीप को उसके 7 साल के बेटे रुद्रांश, सुंदरनगर के हेमराज को उसके 8 साल के बेटे ध्रुव, लंज के इंद्रजीत को उसके 8 साल के भतीजे पीयूष और धर्मशाला के अमन को उसके बड़े भाई रमन ने मुखाग्नि दी।
नहीं देख पाईं बेटों के सिर पर सेहरा
लंज के इंद्रजीत (32) के सिर पर मां सुलोचना और धर्मशाला के पास्सू के अमन कुमार (31) के सिर पर बीना देवी सजा हुआ सेहरा नहीं देख पाईं। शादी से पहले ही उनके बेटों की हत्या कर दी गई।
अवशेष घर पहुंचने पर इंद्रजीत की मां बस यही बोल रही थीं कि मैंने श्याम (इंद्रजीत) को कमाने के लिए विदेश क्यों भेजा। अपने बच्चे के सिर पर सेहरा सजा हुआ देखना था, यह क्या हो गया। मुझे श्याम को दूल्हे के लिबास में देखना है, कोई मेरे श्याम को दूल्हे के लिबास में सजा दो।
पापा तुम कहां चले गए....
संदीप के 7 वर्षीय बेटे रुद्राक्ष ने पिता को मुखाग्नि दी। रुद्राक्ष अवाक होकर सब रस्म क्रियाएं कर रहा था। उसने बस यही कहा.. तुम कहां चले गए। करीब साढ़े चार साल पहले जब संदीप रोजी-रोटी कमाने इराक गया था तो रुद्राक्ष महज ढाई साल का था।
बेटे और परिवार के बेहतर भविष्य के लिए संदीप ने जो ख्वाब देखे थे, वे सब बुजुर्ग माता-पिता और पत्नी के विलाप में ओझल होते दिखे। संदीप जब इराक गया था, उस दौरान रुद्राक्ष अच्छे से पापा भी नहीं बोल पाता था। रुद्राक्ष ने पहली कक्षा और बेटी पुल्कित ने पांचवीं कक्षा की परीक्षा दी है।
15 जून, 2014 को इराक में लापता हुए थे संदीप
संदीप 15 जून, 2014 से इराक में लापता हुए थे। संदीप का जन्म 20 फरवरी 1976 को हुआ था। दुखद संयोग रहा कि जन्मदिन के ठीक एक महीने बाद 20 तारीख को ही संदीप की मौत की पुष्टि हुई। 16 सितंबर, 2013 को संदीप इराक गया था।
15 जून, 2014 को आतंकियों ने अन्य 38 भारतीयों के साथ बंधक बना लिया था। उसी दिन परिजनों को भी दूरभाष पर सूचित किया था और उसके बाद से संदीप का कोई पता नहीं लगा।
संदीप के घर पर पत्नी चंद्रेश के अलावा माता पुष्पा देवी, पिता दिलावर सिंह, तीन बहनें अनीता, ज्योति और नीलम, 11 साल की बेटी पुल्कित तथा सात साल का बेटा रुद्राक्ष हैं। संदीप परिवार का एक मात्र सहारा था। सितंबर 2017 में प्रशासन ने संदीप के माता पिता व बहन के खून के नमूने डीएनए जांच के लिए लिए थे।
13 जून, 2014 को अमन के अगवा होने की मिली थी सूचना
पास्सू गांव का अमन 13 सितंबर, 2013 को अमन इराक गया था। 13 जून, 2014 को रात को अमन ने बड़े भाई को देर रात फोन पर अगवा होने की सूचना दी। इसके बाद अमन का कोई पता नहीं चला। इराक जाने से पूर्व वह चंडीगढ़ में निजी कंपनी में नौकरी करता था।
अमन जब विदेश गया तो उसकी आयु 27 साल की थी। अमन के घर में पिता रमेश, माता बीना देवी, दादी तारा देवी और बड़ा भाई रमन, भाभी और उनके दो बच्चे हैं, जबकि बहन की शादी हो चुकी है।
16 जून, 2014 में हुई थी आखिरी बार बात
इंद्रजीत वर्ष 2013 में इराक के मोसुल शहर में बगदाद की कंपनी टीएनएच (तारिक अन गुल) में फोकलाइन ऑपरेटर की नौकरी करने गया था। 16 जून, 2014 को उसकी आखिरी बार परिवार के लोगों से बात हुई थी।
इंद्रजीत ने उसके साथ टॉर्चर की बात भी कही थी। कहा था कि उनको चार लोग किरकूभेजी स्थान पर ले गए हैं। उसके बाद उनके पासपोर्ट वापस कर दिए थे। इंद्रजीत की भाई सुभाष चंद से आखिरी बात हुई थी।
28 वर्ष की उम्र में इंद्रजीत इराक जाते समय माता-पिता से कहकर गया था कि अब मैं परिवार की गरीबी दूर करूंगा। पैसे कमाऊंगा और माता-पिता को दूंगा।
पिता को दिल की बीमारी, मां को आया था पैरालाइज अटैक
अमन के पार्थिव अवशेष का ताबूत देख कर बहन मधुवाला बेेेेहोश हो गई। वहीं ताबूत देख कर अमन का बड़ा भाई रमन बिल्ख- बिल्ख कर रोया।
केंद्र के 10 और राज्य सरकार के 4 लाख से परिजनों के जख्मों पर मरहम
केंद्र सरकार मोसुल में मारे गए 39 भारतीयों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देगी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात की घोषणा की है। परिजनों ने कहा था कि सरकार जब तक मुआवजे की घोषणा नहीं करेगी तब तक अवशेष स्वीकार नहीं करेंगे।
इसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री ने मुआवजे की घोषणा की है। हिमाचल सरकार पहले ही चारों हिमाचलियों को 4-4 लाख देने की घोषणा कर चुकी है। क्षेत्र के जनप्रतिनिधि परिवार के एक-एक सदस्य को पंजाब की तर्ज पर पेंशन और सरकारी नौकरी देने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, केेंद्र सरकार ने नौकरी देने का अभी आश्वासन ही दिया है।
महज 25 मिनट ही नसीब हुआ घर का आंगन
पांच साल के लंबे इंतजार के बाद हेमराज के पार्थिव अवशेषों को महज 25 मिनट ही घर आंगन नसीब हुआ। इराक के मोसुल में आईएसआईएस के हाथों 38 अन्य भारतीयों के साथ मारे गए सुंदरनगर की बायला पंचायत के हेमराज के पार्थिव अवशेष ताबूत में मंगलवार सुबह 10 बजे पैतृक गांव में रेडक्रॉस
सोसाइटी मंडी की एंबुलेंस में पहुंचे। श्मशानघाट में हेमराज के आठ वर्षीय बेटे ध्रुव ने करीब 11 बजकर 5 मिनट पर मुखाग्नि दी। अवशेषों को खोलने की इजाजत नहीं थी। ताबूत को ही चिता पर रखा गया। सुबह दस बजे हेमराज के पार्थिव अवशेष पहुंचते ही माहौल गमगीन हो गया।
टांडा से पार्थिव अवशेष लाने को हेमराज के छोटे भाई श्रवण कुमार सोमवार रात को रवाना हुए थे। मंगलवार सुबह 5 बजे वे रेडक्रॉस सोसाइटी मंडी के सहयोग से पार्थिव अवशेष लेकर रवाना हुए और सुबह 10 बजे घर पर पहुंचे। इस दौरान हर किसी की आंख नम थी।
चला गया घर को चलाने वाला
एसडीएम फतेहपुर बलवान चंद मंडोत्रा ने इराक के मोसुल में मारे गए फतेहपुर उपमंडल के समकड़ (धमेटा) गांव के निवासी संदीप राणा के पार्थिव अवशेष नूरपुर के शवगृह से उनके घर पर परिजनों को सौंपे।
पूर्व राज्यसभा सांसद कृपाल परमार भी उपस्थित थे। संदीप की चिता को उनके 7 वर्षीय बेटे रुद्रांश ने मुखाग्नि दी। 78 वर्षीय बजुर्ग पिता दिलावर सिंह राणा, 68 वर्षीय माता, पत्नी चंद्रेश कुमारी तथा 11 वर्षीय बेटी पुलकित ताबूत के साथ लिपट लिपट कर रोए।
संदीप को सैकड़ों नम आंखें ने अंतिम विदाई दी। संदीप अपनी तीन बहनों का अकेला भाई था। परिवार की रोजी-रोटी चलाने वाला घर का एकमात्र सदस्य था। संदीप कुमार इराक में अपने परिवार की गरीबी दूर करने गया था। लेकिन, परिजन उसका चेहरा भी नहीं देख पाए।