Himachal: पूर्व मंत्री वजीर केवल सिंह पठानिया का निधन, ईमानदारी व सादगी की रहे मिसाल
ईमानदारी और सादगी की मिसाल रहे पूर्व मंत्री केवल सिंह पठानिया ने अपने जीवन के अंतिम दिनों तक आम जनता से व्यक्तिगत संपर्क बनाए रखा और उनके दिलों में अपनी जगह बनाई।
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सशस्त्र क्रांति के महानायक वीर शिरोमणि वजीर राम सिंह पठानिया के वंशज एवं पूर्व मंत्री केवल सिंह पठानिया (88) का बुधवार देर रात निधन हो गया। पठानिया काफी समय से बीमार चल रहे थे। गुरुवार दोपहर पैतृक गांव बासा वजीरां में राजकीय सम्मान के साथ पठानिया का अंतिम संस्कार किया गया। बेटे राजीव पठानिया ने मुखाग्नि दी। मृतक की अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोगों ने शामिल होकर नम आंखों से विदाई दी। पुलिस की टुकड़ी ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। प्रशासन की ओर से डीएसपी विशाल वर्मा और नायब तहसीलदार गगन सिंह ने श्रद्धांजलि अर्पित की। इससे पहले तहसीलदार राधिका सैनी ने भी शोकाकुल परिवार से मिलकर अपनी संवेदना प्रकट की। इस अवसर पर पूर्व वन मंत्री राकेश पठानिया, पूर्व विधायक राजेश ठाकुर, युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अमित पठानिया, जिला कांग्रेस अध्यक्ष कर्ण सिंह पठानिया, नूरपुर व्यापार मंडल के प्रधान अश्वनी सूरी, नूरपुर ब्लड डोनर्स क्लब के अध्यक्ष राजीव पठानिया, उदय पठानिया सहित लोगों ने श्रद्धांजलि दी।
ईमानदारी और सादगी की मिसाल रहे पूर्व मंत्री केवल सिंह पठानिया ने अपने जीवन के अंतिम दिनों तक आम जनता से व्यक्तिगत संपर्क बनाए रखा और उनके दिलों में अपनी जगह बनाई। वर्ष 1972 में बतौर आजाद प्रत्याशी राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत करने वाले पूर्व मंत्री केवल सिंह पठानिया को दो बार नूरपुर हलके का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला है। इसके बाद 1993 के मध्यावधि चुनाव में एक समझौते के तहत केवल सिंह पठानिया कांग्रेस में शामिल हो गए और ज्वालामुखी हलके से चुनाव जीतकर वीरभद्र सरकार में परिवहन मंत्री बने।
1937 में जन्मे वजीर केवल सिंह पठानिया दो बार विधायक और एक बार कैबिनेट मंत्री बने। उनका राजनीतिक सफर संघर्ष और उपलब्धियों से भरा रहा। कांग्रेस परिवार से होने के बावजूद, उन्होंने आजाद और अन्य दलों से चुनाव लड़े। सक्रिय राजनीति में आने से पहले वजीर केवल पठानिया 1968 में पहली बार ब्लॉक समिति के अध्यक्ष चुने गए। 1972 में उन्होंने आजाद उम्मीदवार के रूप में पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। तब उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता सत महाजन को हराया।
हालांकि, कांग्रेस ने उन्हें पार्टी में शामिल नहीं किया, क्योंकि सत महाजन प्रदेशाध्यक्ष बन चुके थे। 1977 में जनता पार्टी और 1982 में आजाद प्रत्याशी के तौर पर वह सत महाजन से चुनाव हार गए। 1985 में वीरभद्र सिंह के कहने पर उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन 1989 में कांग्रेस छोड़कर जनता दल के झंडे तले चुनाव लड़ा और सत महाजन को हराया। 1993 में जनता दल का कांग्रेस में विलय हुआ, जिसके बाद केवल सिंह पठानिया ने ज्वालामुखी से चुनाव जीता और कांग्रेस सरकार में परिवहन मंत्री बने। 1998 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2003 में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा और 2007 में बसपा के झंडे तले चुनाव लड़ा।
केवल कभी थे सत महाजन के चालक, फिर उन्हें ही चुनाव में हराया
पूर्व मंत्री केवल सिंह पठानिया के निधन पर वीरवार को विधानसभा सदन में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने शोकोद्गार प्रस्ताव रखा। मुख्यमंत्री ने बताया कि बुधवार रात पूर्व मंत्री का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पठानिया का जन्म 29 जून 1937 को जिला कांगड़ा के गांव बासां वजीरां तहसील नूरपुर में हुआ था। दिवंगत केवल 1972, 1990 और 1993 में प्रदेश विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। वह राज्य सरकार में 1995 से 1998 तक परिवहन मंत्री स्वतंत्र प्रभार भी रहे। पठानिया की समाजसेवा में गहरी रुचि थी। नूरपुर से विधायक रणवीर सिंह निक्का ने कहा कि दिवंगत केवल सिंह पठानिया कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता सत महाजन के चालक थे। फिर पठानिया ने नूरपुर से सत महाजन को ही चुनाव भी हराया। नेता विपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि नूरपुर और ज्वालाजी से पठानिया विधायक रहे। पंचायत प्रधान, पंचायत समिति अध्यक्ष और ट्रांसपोर्ट यूनियन पठानकोट के अध्यक्ष भी रहे।
कृषि मंत्री चंद्र कुमार ने कहा कि सहकारिता आंदोलन भी उन्होंने हिस्सा लिया। शाहपुर से विधायक केवल सिंह पठानिया ने कहा कि जब मुझे एनएसयूआई का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो समाचार पत्रों में बड़ी खबर लगी। हम दोनों का एक नाम होने के चलते कई लोग पूर्व मंत्री के घर पर बधाइयां देने पहुंच गए थे। फतेहपुर से विधायक भवानी सिंह पठानिया भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि केवल सिंह पठानिया का उनके पिता दिवंगत सुजान सिंह पठानिया के साथ बहुत लगाव था। उन्होंने मेरे चुनाव में भी मदद की। उनका व्यक्तित्व संघर्षशील था। 1977 में उनके पिता सुजान सिंह पठानिया को भी सक्रिय राजनीति में केवल सिंह पठानिया ही लाए थे। विधायक संजय रतन ने कहा कि 1993 में मेरा टिकट काटकर केवल सिंह पठानिया को ज्वालाजी से कांग्रेस टिकट दिया गया था।
स्पीकर बोले-बजट सत्र के बाद मिलने की हुई थी बात
उधर, विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने कहा कि जब कांगड़ा पंजाब का हिस्सा था। तब केवल के पिता पंजाब में मंत्री थे। अंग्रेजों के खिलाफ भारत में सबसे पहले विद्रोह नूरपुर में हुआ था। वजीर राम सिंह पठानिया की अगुवाई में यह विद्रोह हुआ था। उस समय वजीर राम सिंह पठानिया को अंग्रेजों ने रंगून की जेल में डाल दिया था। जहां उनका निधन हो गया था। पूर्व मंत्री केवल सिंह पठानिया इसी परिवार से थे। विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि कुछ दिन पूर्व ही केवल सिंह पठानिया से मेरी फोन पर बात हुई थी। बजट सत्र के बाद मुझे उनसे मिलना भी था। विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की ओर से शाेक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना जताते हुए निधन पर दुख जताया।