भानुपल्ली-लेह रेल प्रोजेक्ट की राह में वित्तीय संकट का रोड़ा, सरकार के पास नहीं बजट
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सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भानुपल्ली-लेह रेलमार्ग की राह में प्रदेश का वित्तीय संकट रोड़ा बना हुआ है। दशकों पहले हुए समझौते के मुताबिक इस परियोजना का खर्च केंद्र और राज्य को मिलकर वहन करना है। रेलमार्ग निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण में केंद्र को 75 फीसदी तो राज्य को 25 फीसदी खर्च उठाना है।
परियोजना के खर्च में हिस्सेदारी की वजह से ही प्रदेश सरकार के लिए मुश्किल बनी हुई है। ऐसे में प्रोजेक्ट पर काम की गति पर असर पड़ रहा है। वित्तीय संकट का प्रोजेक्ट पर असर कैसे पड़ रहा है, इसकी मिसाल भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया है।
केंद्र ने 70 करोड़ रुपये की राशि जमीन खरीद के लिए दी है, जबकि भानुपल्ली रेललाइन के दस किमी पर ही जमीन अधिग्रहण के लिए 80 करोड़ का खर्च आ रहा है। ऐसे में हिमाचल सरकार के लिए अतिरिक्त राशि जुटाना मुश्किल हो रहा है।
1982 में आया प्रोजेक्ट का प्रस्ताव
भानुपल्ली-लेह रेलमार्ग का प्रस्ताव 1982 में रखा गया था। इसके बाद इस लाइन के लिए तीन बार बरमाणा तक सर्वे किया गया। दशकों बाद जो हालात हैं, उसमें भानुपल्ली से श्री नयनादेवी क्षेत्र तक 10 किमी रेललाइन निर्माण का रास्ता ही साफ हुआ है। वहां तक भी जमीन अधिग्रहण पर आने वाले खर्च को लेकर पेच फंसा है।
तीन सर्वे के बाद मनाली रूट फाइनल
रेललाइन का सर्वे तीन बार हुआ है। पहले भानुपल्ली से बरमाणा तक सर्वे हुआ। इसके बाद सतलुज किनारे से रामपुर होते हुए भी सर्वे किया गया, लेकिन सुरक्षा की दुष्टि से लेह को रेललाइन से जोड़ने के लिए इसे मनाली से होते हुए फाइनल किया गया।
उत्तराखंड में केंद्र उठा रहा सारा खर्च
जानकारी के अनुसार उत्तराखंड में बन रही रेललाइनों के निर्माण को केंद्र सरकार पूरी की पूरी राशि खर्च कर रही है। ऐसे में भानुपल्ली रेललाइन निर्माण में केंद्र की शर्त से प्रदेश के लोग अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं।
इस बारे में प्रदेश सरकार ने केंद्र को पत्र के माध्यम से सूचित किया है। रेलवे निर्माण को केंद्र सरकार से बातचीत जारी है। जिला प्रशासन भी समय-समय पर प्रदेश सरकार को सूचित कर रहा है। जल्द आगे की प्रक्रिया शुरू होगी। - उपायुक्त बिलासपुर, ऋग्वेद ठाकुर
कई राज्यों में 50:50 है केंद्र-राज्य की हिस्सेदारी
सांसद अनुराग ठाकुर का कहना है कि भानुपल्ली-लेह रेल परियोजना में केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच 75:25 अनुपात में खर्च वहन करने का समझौता है। कई राज्यों में तो यह अनुपात 50:50 का है।