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यूपी में फेल, क्या हिमाचल चुनाव में रंग ला पाएगा बेरोजगारी भत्ते का ये नया दांव

Sat, 11 Mar 2017 02:52 PM IST
दयाशंकर शुक्ल सागर/अमर उजाला, शिमला
दयाशंकर शुक्ल सागर/अमर उजाला, शिमला Updated Sat, 11 Mar 2017 02:52 PM IST
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Expert Comment on Unemployement Allowance in Himachal.

करीब 40 हजार करोड़ रुपए के कर्ज में डूबी हिमाचल सरकार ने आखिर बेरोजगारी भत्ते का दांव खेल लिया। सरकार ने नए वित्तीय वर्ष में 12वीं पास बेरोजगारों को हर महीने हजार रुपए देने का वादा किया है। आज के जमाने में इस रकम की चौराहे पर चाय पीने या मोबाइल रीचार्ज करने से ज्यादा की हैसियत नहीं लेकिन यह प्रतीकात्मक संदेश है कि सरकार बेरोजगारों को लेकर कितनी संवेदनशील है।

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पर इसमें कोई शक नहीं कि ना-ना करते बेरोजगारी भत्ता देने का दांव खेलकर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने पार्टी के अंदर और बाहर अपने सभी विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया था। लेकिन सरकार इसकी जगह कौशल विकास भत्ता ले आई।
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1000 रुपए प्रतिमाह का यह भत्ता केवल आईटीआई प्रशिक्षुओं या पंजीकृत कंपनियों में काम करने वाले ट्रेनियों के लिए था। ऐसे कोई डेढ़ लाख बेरोजगार मिले जिन्हें कौशल विकास भत्ता दिया गया। सरकार ने इसके लिए हर साल 100 करोड़ रु. का बजट रखा। लेकिन इसे योजना की नाकामी कहें या हिमाचली बेरोजगारों की अरुचि, सरकार इस योजना में अब तक 400 करोड़ के बजट में आधा पैसा भी खर्च नहीं कर पाई।
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इसलिए विरोधियों को सरकार की नाकामी का ढिंढोरा पीटने का सुनहरा मौका मिल गया था। अपनी ही सरकार को गाहे-बगाहे मुश्किल में डालने वाले मंत्री जीएस बाली ने पिछले दिनों अचानक एक बार फिर बेरोजगारी भत्ते का राग छेड़ दिया। मुख्यमंत्री ने तब कहा था ये योजना व्यवहारिक नहीं और न ही उन्होंने ऐसा कोई चुनावी वादा किया था। लेकिन घोषणापत्र तो कांग्रेस का ही था जिसे तैयार करने वाली कमेटी के अध्यक्ष आनंद शर्मा थे।

तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू को भी बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिल गया। उन्होंने आनन-फानन में कांग्रेस की एक कमेटी बनाकर मुख्यमंत्री पर दबाव डाला कि वे चुनावी साल में किसी तरह ये वादा पूरा करें। वर्ना आने वाले चुनाव के नतीजों के लिए वे जिम्मेदार नहीं होंगे। जब कांग्रेस ने अपनी ही सरकार पर बेरोजगारी भत्ते को लेकर आड़े हाथ लेना शुरू कर दिया तो भाजपा क्यों कर पीछे रहती। भाजपा ने वीरभद्र पर वादाखिलाफी के आरोप जड़ना शुरू कर दिए। चौतरफा घिरी वीरभद्र सरकार ने अपने राजनीतिक जीवन के 20वें बजट भाषण में जो धमका किया उसने सबको तकरीबन चौंका दिया।

यूपी में फेल हो चुका है फॉर्मूला

Expert Comment on Unemployement Allowance in Himachal.

इस पृष्ठभूमि में आधी-अधूरी तैयारी के साथ बेरोजगारी भत्ते का जो एलान हुआ, वह सबके सामने है। सरकार को अब तक यह नहीं मालूम कि इस योजना में बेरोजगारी भत्ता पाने वाले संभावित बेरोजगार कितने हैं। सेवायोजन दफ्तर में ऐसे कितने 12वीं पास पंजीकृत हैं। बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए शर्तें क्या होंगी? इनकी पारिवारिक आय कितनी होनी चाहिए? ये भत्ता पाने के हकदार किस आयु वर्ग के बेरोजगार होंगे?

हिमाचल बेरोजगारी भत्ते का शिगूफा छोड़ने वाला पहला राज्य नहीं है। सबसे पहले मुलायम सिंह यादव की सरकार ने यूपी में बेरोजगारी भत्ते का दांव खेला था। लेकिन ये योजना परवान नहीं चढ़ सकी। बाद में अखिलेश की सरकार ने लैपटाप बांटने के साथ इस योजना को पहली बार अगस्त 2012 में शुरू किया। तय किया गया कि 25 से 40 साल की उम्र के 12वीं पास पंजीकृत बेरोजगारों को एक हजार रु. प्रतिमाह भत्ता दिया जाएगा।

तीन महीने का भत्ता उनके खातों में जमा भी हुआ। सेवायोजन दफ्तरों में पंजीकरण के लिए युवाओं की लाइन लग गई। यूपी में तब ऐसे कोई 15 लाख पंजीकृत बेरोजगार थे। वर्ष 2012-13 में उनके लिए 1100 करोड़ और वर्ष 2013-14 के लिए 1600 करोड़ रु. का बजट प्रावधान किया गया। लेकिन जून 2014 के बाद लैपटॉप और बेरोजगारी भत्ते देने की योजना सरकार ने चुपचाप निरस्त कर दी।

इसकी वजह यह थी कि तब हाल ही हुए लोकसभा चुनाव को सपा को करारी शिकस्त मिली थी। यूपी का युवा वोटर लैपटॉप और बेरोजगारी भत्ता भूल कर मोदी पर मेहरबान हो गया। जब अखिलेश से पूछा गया कि ये महत्वाकांक्षी योजना बंद क्यों कर दी गई तो उनका जवाब था अब हमारा फोकस गांव और किसान हैं। जबकि सच यह है कि तब तक यूपी में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या बढ़कर 70 लाख हो गई थी। और सरकार सबको भत्ता नहीं दे पाने की हालत में नहीं थी

योजना से बाहर होने वाले बेरोजगार करेंगे फैसला

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हिमाचल में इस योजना का हश्र क्या होगा ये वक्त बताएगा लेकिन कांग्रेस ने बेरोजगारी भत्ते का कार्ड चल कर पहला दांव जीत लिया। बेरोजगारी भत्ता देने के लिए सरकार के पास अप्रैल से अगस्त-सितंबर तक का वक्त है। इसके बाद आचार संहिता लग जाएगी। जितने बेरोजगार इससे लाभान्वित होंगे उनका चुनाव में नैतिक समर्थन बेशक कांग्रेस के साथ होगा। योजना परवान नहीं चढ़ी तो क्या होगा कहने की जरूरत नहीं। योजना से बाहर हुए बेरोजगारों की भी नाराजगी इसी सरकार पर टूटेगी।

बहरहाल यह मुद्दा भाजपा के हाथ से छिन गया है। अब वोटरों को लुभाने के लिए भाजपा को कोई नया आइडिया लाना होगा। सरकारी मशीनरी को इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। राज्य के पास अपने संसाधन नहीं हैं इसलिए भत्ते बांटने के लिए भी कर्ज पर निर्भर रहना होगा। यह रास्ता जितना सीधा दिखता है उतना है नहीं।

लेकिन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की राजनीति का अपना अलग अंदाज है। जैसा कि आज उन्होंने खुद सदन में बजट भाषण के दौरान शेर पढ़ा - मेरा यही अंदाज जमाने को खलता है। इतनी मुश्किलें सह कर भी यह सीधा कैसे चलता है।

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