कर्मचारियों की सरकार को चुनौती! खतरे में ट्रिब्यूनल
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केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद हिमाचल सरकार के प्रशासनिक ट्रिब्यूनल बहाली के फैसले को कर्मचारियों के कुछ संगठन चुनौती देने वाले हैं।
ये वकीलों से मंत्रणा कर रहे हैं कि इस निर्णय को हाईकोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है या नहीं। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ताओं से भी विचार-विमर्श हो रहा है।
कुछ कर्मचारी संगठन प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को खोलना कर्मचारियों के हित में नहीं मान रहे हैं। हिमाचल प्रदेश मंत्रिमंडल ने राज्य में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की बहाली का निर्णय लिया है।
भारत सरकार से मिली मंजूरी
इसके लिए बाकायदा भारत सरकार की अनुमति ली गई है। प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की बहाली कांग्रेस घोषणा पत्र की भी प्रमुख घोषणाओं में शुमार रही है।
ट्रिब्यूनल राज्य सरकार के कर्मचारियों के मामलों की सुनवाई करता है। हिमाचल की भाजपा सरकार ने 2008 में इस ट्रिब्यूनल को भंग कर दिया गया था। यह 1985-86 से कार्यरत था।
इसे भंग करने के बाद हजारों मामलों को हिमाचल हाईकोर्ट के लिए हस्तांतरित किया गया था। कुछ कर्मचारी संगठन इस संबंध में वकीलों से बात कर रहे हैं। वह प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को कर्मचारियों के हित में नहीं मान रहे हैं।
2008 में भंग हुआ था ट्रिब्यूनल
कर्मचारी नेता सुरेंद्र ठाकुर ने बताया कि इसे मंजूरी वर्तमान एनडीए सरकार ने ही दी है। अब स्वीकृति मिल गई है तो क्या कह सकते हैं। इस पर पहले ही खूब कहा जा चुका है।
भाजपा के समय से कर्मचारी नेता इसका विरोध कर रहे हैं। ये नेता भूल गए हैं कि उन्हें भी तबादले होने पर ट्रिब्यूनल से ही राहत मिली थी।
हिमाचल प्रदेश कर्मचारी महासंघ अध्यक्ष एसएस जोगटा ने बताया कि ट्रिब्यूनल से सस्ता और जल्दी न्याय मिलेगा। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कर्मचारियों के हितैषी होने का प्रमाण पेश किया है।
हम वकीलों से डिस्कस कर रहे हैं कि प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की बहाली के खिलाफ कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है या नहीं। अगर ऐसा करना संभव है तो इस दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
कर्मचारियों के कुछ संगठन इस बारे में एकजुट हो सकते हैं। पूर्व सरकार के कार्यकाल में भी प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को कर्मचारियों के दबाव में ही भंग किया गया था।