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देव आस्था: हिमाचल की इस चोटी पर चिमटा मारने पर आज भी निकल आता है पानी, पढ़ें रोचक जानकारी

Tue, 22 Nov 2022 12:22 PM IST
Krishan Singh त्रिपुरारी सांख्यान, संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
त्रिपुरारी सांख्यान, संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी Published by: Krishan Singh Updated Tue, 22 Nov 2022 12:22 PM IST
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सार
हिमाचल प्रदेश के कई मंदिर कई रहस्यों से भरे पड़े हैं। इसके वैज्ञानिक पहलू भी हैं लेकिन देव आस्था इन वैज्ञानिक पहलुओं पर हावी रहती है। 
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dev astha,  Water still comes out on hitting chimta tongs on Garhpati Nag Chawasi peak of Himachal, read inter
गढ़पति नाग च्वासी मंदिर। - फोटो : संवाद

विस्तार

देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कई मंदिर कई रहस्यों से भरे पड़े हैं। इसके वैज्ञानिक पहलू भी हैं लेकिन देव आस्था इन वैज्ञानिक पहलुओं पर हावी रहती है।  ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध मंडी जिले के करसोग क्षेत्र में गढ़पति नाग च्वासी के मंदिर में आज भी मन्नतें पूरी होने पर चिमटे चढ़ाए जाते हैं। लोगों की देव आस्था इतनी गहरी है कि कतांडा के पास ऊंची चोटी पर स्थित नाग च्वासी के मंदिर के पास चिमटा मारने से वह पानी से गीला हो जाता है। ऐसे में यहां पर सैकड़ों छोटे बड़े चिमटे श्रद्धालुओं ने मन्नतें पूरी होने पर चढ़ाए हैं। गढ़पति नाग च्वासी के इतिहास और मान्यता पर नजर दौड़ाएं तो इस स्थान पर स्वयं गुरु गोरखनाथ, चरपट नाथ, भरतरीनाथ, गोपीनाथ आदि सिद्धों का आना हुआ था और यहां पर वह कुछ समय के लिए ठहरे थे।



चिमटा सिद्ध नाथ परंपरा का चिन्ह माना जाता है। इसलिए इनके मंदिर में आज तक हजारों छोटे-बड़े चिमटे देखे जा सकते हैं। इन सिद्धाें का प्रभाव आज भी यहां पर देखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां शिलारूप में विराजमान सिद्घों के दर्शन मात्र से ही लोगों के दुख, तकलीफ व कष्ट दूर हो जाते हैं। उनकी सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं। दूर-दूर से लोग यहां बड़ी संख्या में मन्नतें मांगने आते हैं। मन्नतें पूरी होने पर सिद्ध बाबा को चिमटे भेंट किए जाते हैं। दो  से लेकर नौ फीट लंबे चिमटे देख भक्तजन मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। चिमटों की संख्या अधिक होने के बाद इन चिमटों को महोग स्थित नाग कोठी में कमरे के बराबर विशाल कड़ाही में रखा जाता है।


यह है मान्यता
किंवदंती के अनुसार गुरु गोरखनाथ अपने चेलों सहित जब इस स्थान पर आए तो यहां पर पानी नहीं होने के चलते उनके चेलों को प्यास के कारण दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस पर इनमें से किसी सिद्ध के द्वारा अपने चिमटे से सूखी जमीन पर चिमटा मारा तो पानी की धारा बहने लगी। ऐसा दावा है कि आज भी अगर यहां पर इस जमीन पर चिमटे को मारा जाए तो पानी निकल आता है, जबकि यहां पर पानी का कहीं कोई स्त्रोत भी नहीं है। मान्यता है कि इस मंदिर में संतान प्राप्ति और भूत-पिशाच से मुक्ति के लिए की गई मन्नतें पूरी होती हैं।

एक अन्य मान्यता
मंदिर कमेटी के कार्यकर्ता टीसी ठाकुर का कहना है कि गढ़पति नाग च्वासी सिद्ध  का देवरथ भी महोग स्थित कोठी में विराजमान है। देवरथ में फिरनु की दो जुलाहियां भी मुखौटे रूप में विराजती हैं। मान्यता है कि किसी समय नाग देवता के सतलुज नदी पर शाही स्नान के दौरान यह दोनों नाग देवता के साथ आई थीं। नाग देवता ने उन्हें अपने रथ पर मध्य भाग में स्थान दिया है। नाग च्वासी के सहयोगी गण (चाकर) मुख्य चाकर (जेठा) छौई ,ढबराची, खोड़ू तथा लूहरी नाग भी हैं।
 

समुद्रतल से 8,459 फीट की ऊंचाई पर स्थित

नाग च्वासी मंदिर करसोग।
नाग च्वासी मंदिर करसोग। - फोटो : संवाद

च्वासीगढ़ मनमोहक प्राकृतिक छटा, आकर्षक नजारों व विहंगम प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर एक सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। समुद्रतल से 8, 459 फीट की ऊंचाई पर स्थित च्वासीगढ में प्रकृति ने अपनी अनुपम कृति यहां चारों ओर बिखेर रखी है। पर्यटक यहां के अति सुंदर व अद्भुत प्राकृतिक दृष्यों को देखकर हर्षित, रोमांचित और भाव-विभोर हो उठते हैं। यहां से एक ओर जहां हिमालय की विशालता व इसकी बर्फ से ढकी चोटियों का दीदार कर सकते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रसिद्ध पर्यटक स्थल शिमला, नारकंडा, जलोड़ी जोत, धमून टिब्बा व आसपास के प्रकृतिक नजारों का विहंगम दृष्टि अवलोकन भी किया जा सकता है।

पर्यटकों का मन मोह लेता है प्राकृतिक सौंदर्य
आसपास के क्षेत्र में फैले देवदार, बान समेत अन्य प्रजातियों के पेड़ाें के  घने जंगल, सेब के बागीचे सहज रूप से ही पर्यटकों का मन हर लेते हैं। यहां का शुद्ध वातावरण मन, मस्तिष्क और शरीर को स्फूर्ति, उल्लास, उमंग से भर देता है। यहां आकर पर्यटकों व श्रद्धालुओं के मन को शांति, शीतलता व सुकून मिल जाता है।  च्वासीगढ का सांस्कृतिक अध्ययन कर लौटे स्नातक अध्यापक मेहर सिंह राठौर और प्रवक्ता अमर चंद शर्मा, सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती की जिला सलाहकार लीना शर्मा  का कहना है कि ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध च्वासीगढ के मध्य सिद्ध बाबा का मंदिर पहाड़ी भवन निर्माण शैली में निर्मित किया गया है।

क्या कहते हैं इतिहासकार
सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डॉक्टर हिमेंद्र बाली हिम का कहना है कि च्वासीगढ़ सुकेत रियासत के सबसे सुदृढ़ गढ़ों में से एक रहा है। रियासत की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित च्वासी गढ़ नाग सिद्ध परंपरा का केंद्र रहा है। च्वासी ग्याहरवीं बारहवीं शताब्दी में चंबा के सिद्ध नाथ परंपरा के चौरासी सिद्धों की ओर से स्थापित सिद्ध पीठ है। इसी कालावधि में गुरु गोरखनाथ के नेतृत्व में पश्चिमी हिमालय से लेकर सुदूर दक्षिण और मध्य एशिया तक हिंदू धर्म की हठयोग परंपरा का विस्तार हुआ था। इसी समयावधि में यहां सिद्ध नाथ परंपरा की विख्यात पीठ स्थापित हुई। च्वासी में सिद्ध परंपरा के साथ नाग परंपरा का संयोजन यहां की सांस्कृतिक वशिष्ठता है।

सालभर रहता है श्रद्घालुओं का तांता
वैसे तो च्वासीगढ़ में पूरे साल श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन मकर संक्रांति व बैशाखी पर यहां विशेष भीड़ रहती है। सुकेत रियासत के राजा ने यहां गढ़ यानि अभेद्य किले का निर्माण किया था। किले को अभेद्य बनाने के दृष्टिगत इस किले के तीन ओर एक गहरी खाई का निर्माण किया गया था। चौथी ओर प्राकृतिक रूप से गहरी खाई थी। राजा के सैनिक किले की सुरक्षा में 24 घंटे तैनात रहते थे। किले में पेयजल आपूर्ति करने के लिए वर्षाजल संग्रहण तकनीक अपनाई गई थी। इसके अवशेष आज भी विद्यमान हैं। उत्खनन कार्य से निकली देवदार के पुष्ट शहतीरों से बनी विशाल बावड़ी पर्यटकों व श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। सदियों पुरानी मूर्तियों के कुछ अवशेष भी यहां मौजूद हैं। कुछ खंडित कलात्मक मूर्तियां जमीन में भी दबी होंगी। परिसर में कहीं पर उत्खनन करें तो प्राचीन अवशेष जरूर मिलेंगे।

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