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अनूठी है सैकड़ों साल पुरानी बाबे दा ब्याह की परंपरा
बटाला।
Updated Sun, 31 Aug 2014 10:41 PM IST
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सैकड़ों वर्षों से चली आ रही गुरु नानक देव के विवाह की पंरपरा आज भी कायम है। सिख जगत में यह पर्व विश्व स्तर पर मनाया जाता है। बटाला में विवाह समारोह के आयोजन की परंपरा सैकड़ों सालों से आज भी चल रही है। परंपरा को बाबे दा मेला या बाबे दा ब्याह के नाम से भी जाना जाता है।
कहा जाता है कि गुरु नानक देव से बटाला के रहने वाले मूल चंद पटवारी की बेटी बीबी सुलखनी से सगाई हुई थी। इसी लिए यहां ऐसी परंपरा निभाई जाने लगी। इस विवाह पर्व को देखने के लिए सिख संगत देश-विदेश से यहां आती है। विश्व स्तरीय पहचान वाले इस आयोजन के मौके पर बटाला स्थित गुरुद्वारा कंध साहिब में शीशे के फ्रेम में सुरक्षित कच्ची दीवार के दर्शनों के लिए संगत उत्सुक रहती है।
मान्यता है कि भादों शुदी सातवीं संवत 1554 अर्थात वर्ष 1487 में गुरु नानक देव बारातियों सहित सुल्तानपुर लोधी से कपूरथला, सुबानपुर ,बाबा बकाला से होते हुए बटाला पहुंचे थे। गुरु की बारात के बटाला में पहुंचने पर यहां के लोगों तथा रिश्तेदारों के साथ अजिता रंधावा ने उनका स्वागत किया था।
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जिस स्थान पर बारात को ठहराया गया था, वह आजकल गुरुद्वारा श्री कंध साहिब के नाम से जाना जाता है। इसी वजह से यह कंध विख्यात है। जिस जगह पर गुरु के फेरों की परंपरा निभाई गई ,वह आजकल गुरुद्वारा डेहरा साहिब के नाम से प्रचलित है।
आज भी सुरक्षित है दीवार :
कंध साहिब के बारे में कहा जाता है कि यहां पर जिस समय गुरु की बारात को ठहराई गई, उस दौरान बारिश हो रही थी। वहीं एक कच्ची दीवार के नजदीक बाबा नानक को बैठना था। जब गुरु नानक दीवार के पास बैठे तभी एक बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि यह (दीवार) कंध कच्ची है और गिरने वाली है।
इसलिए वे वहां से उठ जाएं। इतना सुनकर गुरु ने कहा कि माता यह दीवार तो युगों-युगों तक कायम रहेगी। वह कच्ची दीवार आज भी गुरुद्वारा कंध साहिब में शीशे के फ्रेम में सुरक्षित है। इस स्थान पर महाराजा नौनिहाल सिंह ने गुरुद्वारा साहिब का निर्माण कराया था। इस गुरुद्वारे का नाम गुरुद्वारा कंध साहिब रखा गया। आजकल इस गुरुद्वारें का प्रंबंध शिरोमणि प्रंबधक कमेटी के पास है।
सजती है गुरुग्रंथ साहिब की पालकी :
बटाला के इस प्रसिद्ध मेले में श्रद्धालुओं का तांता कई दिन पहले ही लगना शुरू हो जाता है। पंजाब व अन्य स्थानों से भी लोग इस समारोह में शामिल होते हैं। इस दिन गुरु ग्रंथ साहिब को पालकी में सुशोभित किया जाता है। साथ ही नगर कीर्तन का आयोजन होता है। इस आयोजन में हजारों लोग शामिल होते हैं।
जगह-जगह लंगर लगाए जातें हैं। रात को शहर में जगह-जगह दीवान सजाए जाते हैं, जिसमें गुरु की वाणी का बखान किया जाता है। वहीं मेले में बच्चों के मनोरंजन के प्रबंध होते हैं। वहीं सभी गुरुद्वारों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है।
सुलतानपुर लोधी से बटाला के लिए निकली बारात
बटाला । पहली पातशाही गुरु नानक देव के 527 वें विवाह पर्व के उपलक्ष्य में इस बार भी विवाह की परंपरा निभाई जा रही है। इसके तहत रविवार की सुबह सुल्तानपुर लोधी से बटाला के लिए गुरु नानक देव की बारात रवाना हो गई। बारात में इस बार भी गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु नानक देव के स्वरूप के रूप में प्रतीकात्मक तौर पर शामिल किया गया।
बारात का धार्मिक ,सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने भव्य स्वागत किया।अब एक सितंबर को गुरुद्वारा डेहरा साहिब बटाला से परंपरागत नगर कीर्तन निकाला जाएगा।
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कहा जाता है कि गुरु नानक देव से बटाला के रहने वाले मूल चंद पटवारी की बेटी बीबी सुलखनी से सगाई हुई थी। इसी लिए यहां ऐसी परंपरा निभाई जाने लगी। इस विवाह पर्व को देखने के लिए सिख संगत देश-विदेश से यहां आती है। विश्व स्तरीय पहचान वाले इस आयोजन के मौके पर बटाला स्थित गुरुद्वारा कंध साहिब में शीशे के फ्रेम में सुरक्षित कच्ची दीवार के दर्शनों के लिए संगत उत्सुक रहती है।
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मान्यता है कि भादों शुदी सातवीं संवत 1554 अर्थात वर्ष 1487 में गुरु नानक देव बारातियों सहित सुल्तानपुर लोधी से कपूरथला, सुबानपुर ,बाबा बकाला से होते हुए बटाला पहुंचे थे। गुरु की बारात के बटाला में पहुंचने पर यहां के लोगों तथा रिश्तेदारों के साथ अजिता रंधावा ने उनका स्वागत किया था।
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जिस स्थान पर बारात को ठहराया गया था, वह आजकल गुरुद्वारा श्री कंध साहिब के नाम से जाना जाता है। इसी वजह से यह कंध विख्यात है। जिस जगह पर गुरु के फेरों की परंपरा निभाई गई ,वह आजकल गुरुद्वारा डेहरा साहिब के नाम से प्रचलित है।
आज भी सुरक्षित है दीवार :
कंध साहिब के बारे में कहा जाता है कि यहां पर जिस समय गुरु की बारात को ठहराई गई, उस दौरान बारिश हो रही थी। वहीं एक कच्ची दीवार के नजदीक बाबा नानक को बैठना था। जब गुरु नानक दीवार के पास बैठे तभी एक बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि यह (दीवार) कंध कच्ची है और गिरने वाली है।
इसलिए वे वहां से उठ जाएं। इतना सुनकर गुरु ने कहा कि माता यह दीवार तो युगों-युगों तक कायम रहेगी। वह कच्ची दीवार आज भी गुरुद्वारा कंध साहिब में शीशे के फ्रेम में सुरक्षित है। इस स्थान पर महाराजा नौनिहाल सिंह ने गुरुद्वारा साहिब का निर्माण कराया था। इस गुरुद्वारे का नाम गुरुद्वारा कंध साहिब रखा गया। आजकल इस गुरुद्वारें का प्रंबंध शिरोमणि प्रंबधक कमेटी के पास है।
सजती है गुरुग्रंथ साहिब की पालकी :
बटाला के इस प्रसिद्ध मेले में श्रद्धालुओं का तांता कई दिन पहले ही लगना शुरू हो जाता है। पंजाब व अन्य स्थानों से भी लोग इस समारोह में शामिल होते हैं। इस दिन गुरु ग्रंथ साहिब को पालकी में सुशोभित किया जाता है। साथ ही नगर कीर्तन का आयोजन होता है। इस आयोजन में हजारों लोग शामिल होते हैं।
जगह-जगह लंगर लगाए जातें हैं। रात को शहर में जगह-जगह दीवान सजाए जाते हैं, जिसमें गुरु की वाणी का बखान किया जाता है। वहीं मेले में बच्चों के मनोरंजन के प्रबंध होते हैं। वहीं सभी गुरुद्वारों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है।
सुलतानपुर लोधी से बटाला के लिए निकली बारात
बटाला । पहली पातशाही गुरु नानक देव के 527 वें विवाह पर्व के उपलक्ष्य में इस बार भी विवाह की परंपरा निभाई जा रही है। इसके तहत रविवार की सुबह सुल्तानपुर लोधी से बटाला के लिए गुरु नानक देव की बारात रवाना हो गई। बारात में इस बार भी गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु नानक देव के स्वरूप के रूप में प्रतीकात्मक तौर पर शामिल किया गया।
बारात का धार्मिक ,सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने भव्य स्वागत किया।अब एक सितंबर को गुरुद्वारा डेहरा साहिब बटाला से परंपरागत नगर कीर्तन निकाला जाएगा।