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Shimla News: पुलिस पर गाड़ी चढ़ाने के प्रयास में आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी खारिज, 24 को तय होंगे आरोप
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चार्ज तय करने के चरण में सबूतों का सूक्ष्म परीक्षण जरूरी नहीं, प्रथम दृष्टया मामला बनता है
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। मादक पदार्थ (एनडीपीएस एक्ट) और पुलिस पार्टी पर गाड़ी चढ़ाने के प्रयास से जुड़े मामले में विशेष अदालत से मुख्य आरोपी को बड़ा झटका लगा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-1 प्रवीण गर्ग की अदालत ने आरोपी की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 250 के तहत दायर आरोप-मुक्ति (डिस्चार्ज) याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के स्तर पर अभियोजन पक्ष के गवाहों और साक्ष्यों का बारीकी से मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। प्रथम दृष्टया मामला बनने पर केस का ट्रायल चलना तय है। अब मामले में 24 सितंबर को आरोप तय किए जाएंगे।
सुनवाई के दौरान आरोपी रमनजीत के अधिवक्ता राजेंद्र सिंह बैंस ने अदालत में दलील दी कि पुलिस की जांच में कई गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां और विरोधाभास हैं। पुलिस का दावा था कि भागने के दौरान खिड़की का शीशा टूटने से आरोपी को चोटें आईं जबकि एमएलसी में चोटें ब्लंट किस्म की दर्ज हैं। अदालत की ओर से वाहन की एचआरटीसी से मेकेनिकल जांच के निर्देश के बावजूद पुलिस ने इसकी जांच फॉरेंसिक विभाग से करवाई। फॉरेंसिक रिपोर्ट में पीछे से टक्कर का जिक्र होने के बावजूद गाड़ी का पिछला हिस्सा पूरी तरह सही सलामत था। वहीं, लोक अभियोजक ने अर्जी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड पर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।
उन्होंने दलील दी कि बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए विरोधाभासों और प्रक्रियात्मक खामियों का निपटारा सिर्फ गवाही और ट्रायल के दौरान ही हो सकता है, आरोप तय करने के प्राथमिक स्तर पर नहीं। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (ओमवती बनाम राज्य, आदि) का हवाला देते हुए कहा कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मजबूत संदेह पैदा होता है या नहीं। अदालत ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 180 के तहत दर्ज गवाहों के बयान और दस्तावेजी साक्ष्य मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं। बचाव पक्ष की दलीलें साक्ष्यों की विवेचना से जुड़ी हैं जिनके आधार पर इस स्तर पर डिस्चार्ज नहीं दिया जा सकता।
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। मादक पदार्थ (एनडीपीएस एक्ट) और पुलिस पार्टी पर गाड़ी चढ़ाने के प्रयास से जुड़े मामले में विशेष अदालत से मुख्य आरोपी को बड़ा झटका लगा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-1 प्रवीण गर्ग की अदालत ने आरोपी की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 250 के तहत दायर आरोप-मुक्ति (डिस्चार्ज) याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के स्तर पर अभियोजन पक्ष के गवाहों और साक्ष्यों का बारीकी से मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। प्रथम दृष्टया मामला बनने पर केस का ट्रायल चलना तय है। अब मामले में 24 सितंबर को आरोप तय किए जाएंगे।
सुनवाई के दौरान आरोपी रमनजीत के अधिवक्ता राजेंद्र सिंह बैंस ने अदालत में दलील दी कि पुलिस की जांच में कई गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां और विरोधाभास हैं। पुलिस का दावा था कि भागने के दौरान खिड़की का शीशा टूटने से आरोपी को चोटें आईं जबकि एमएलसी में चोटें ब्लंट किस्म की दर्ज हैं। अदालत की ओर से वाहन की एचआरटीसी से मेकेनिकल जांच के निर्देश के बावजूद पुलिस ने इसकी जांच फॉरेंसिक विभाग से करवाई। फॉरेंसिक रिपोर्ट में पीछे से टक्कर का जिक्र होने के बावजूद गाड़ी का पिछला हिस्सा पूरी तरह सही सलामत था। वहीं, लोक अभियोजक ने अर्जी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड पर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।
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उन्होंने दलील दी कि बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए विरोधाभासों और प्रक्रियात्मक खामियों का निपटारा सिर्फ गवाही और ट्रायल के दौरान ही हो सकता है, आरोप तय करने के प्राथमिक स्तर पर नहीं। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (ओमवती बनाम राज्य, आदि) का हवाला देते हुए कहा कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मजबूत संदेह पैदा होता है या नहीं। अदालत ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 180 के तहत दर्ज गवाहों के बयान और दस्तावेजी साक्ष्य मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं। बचाव पक्ष की दलीलें साक्ष्यों की विवेचना से जुड़ी हैं जिनके आधार पर इस स्तर पर डिस्चार्ज नहीं दिया जा सकता।
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