हिमाचल हाईकोर्ट: पंचायत के पास सदियों पुरानी किन्नौर कैलाश धार्मिक यात्रा को रोकने का कोई कानूनी अधिकार नही
हाईकोर्ट ने किन्नौर जिले की पोवारी पंचायत के उस विवादास्पद फैसले पर स्थायी रोक लगा दी है, जिसमें किन्नौर कैलाश यात्रा पर स्थायी रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया था। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने मामले का निपटारा करते हुए पहले से ही पारित अंतरिम आदेश को स्थायी करने का फैसला दिया है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने किन्नौर जिले की पोवारी पंचायत के उस विवादास्पद फैसले पर स्थायी रोक लगा दी है, जिसमें किन्नौर कैलाश यात्रा पर स्थायी रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया था। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने मामले का निपटारा करते हुए पहले से ही पारित अंतरिम आदेश को स्थायी करने का फैसला दिया है। उल्लेखनीय है कि 22 जुलाई को हाईकोर्ट ने पंचायत पवारी की ओर से यात्रा पर लगाई गई रोक को हटाते हुए कहा कि पंचायत के पास सदियों से चली आ रही इस धार्मिक यात्रा को रोकने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। पोवारी पंचायत ने 13 जुलाई 2026 को एक प्रस्ताव पारित किया था। ग्राम सभा की विशेष बैठक में मौजूद 112 लोगों ने यात्रा का विरोध किया था, जबकि 62 लोग इसके समर्थन में थे। बहुमत के आधार पर पंचायत ने यात्रा को हमेशा के लिए रोकने का फरमान सुना दिया। पंचायत ने यात्रा के आयोजन से जुड़ी पंजीकृत संस्था श्री प्रकाशंकरा किन्नौर कैलाश यात्रा सोसायटी को भी अवैध रूप से भंग करने का आदेश दे दिया था। अदालत ने जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया था कि सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कराते हुए यात्रा का सुचारू संचालन सुनिश्चित किया जाए। पोवारी पंचायत को यात्रा में किसी भी तरह की बाधा या हस्तक्षेप न करने के लिए कड़ाई से पाबंद किया गया था।
बिना अदालत की मंजूरी स्टांप पेपर का तलाकनामा अमान्य, वसीयत को वैध
प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत बिना अदालत की मंजूरी या बिना पुख्ता रूप से सिद्ध की गई परंपरा के स्टांप पेपर पर लिखा गया तलाकनामा कानूनी रूप से मान्य नहीं है। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने चंबा जिले से जुड़े एक पुराने भूमि विवाद मामले को लेकर दायर अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने इसके साथ ही मृतक की ओर से निष्पादित की गई पंजीकृत वसीयत को वैध माना है। अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म में विवाह को एक संस्कार माना गया है। कानूनन, प्रथागत तलाक को तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसे अदालत के समक्ष ठोस गवाहों और साक्ष्यों के साथ साबित न किया जाए। इस मामले में पारंपरिक तलाक का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला।
यह विवाद श्रीधर नाम के व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी भूमि के मालिकाना हक को लेकर शुरू हुआ था। वादी भिंद्रो ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर कहा था कि श्रीधर ने 11 सितंबर 1997 को उनके पक्ष में एक पंजीकृत वसीयत की थी। उन्होंने दावा किया कि श्रीधर ने अपनी पहली पत्नी कांतो को 21 मई 1976 को ही तलाक दे दिया था, जिसके बाद कांतो ने शिव राम नामक व्यक्ति से दूसरी शादी कर ली थी। दूसरी तरफ कांतो ने खुद को श्रीधर की कानूनी विधवा और अपनी बेटी को उनकी वारिस बताते हुए वसीयत को फर्जी और संदेहास्पद करार दिया था।अदालत ने पाया कि वसीयत पूरी तरह कानूनी नियमों (भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63) के तहत लिखी और पंजीकृत की गई थी। गवाहों की मौजूदगी में श्रीधर ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। सिर्फ लाभार्थी की उपस्थिति मात्र से वसीयत को संदेहास्पद नहीं माना जा सकता।