हिमाचल में बढ़ रहा चरस और अफीम की खेती का दायरा
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तमाम दावों के बावजूद हिमाचल में चरस की खेती का दायरा कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है। चरस और अफीम के लिए देश विदेश में हिमाचल को नशे की राजधानी के रूप में देखा जाने लगा है। यहां पर नशे का इस्तेमाल तो बढ़ा ही है।
साथ ही नशीले पदार्थ की पैदावार में भी इजाफा हुआ है। प्रदेश के कुल्लू, मंडी, धर्मशाला, कसोल, मनीकरन, बंजार वैली, किन्नौर और अपर शिमला के इलाकों में भांग (चरस) और अफीम खेती हो रही है। प्रदेश में साल 2015 में करीब तीन हजार बीघा भांग की खेती को सीज किया गया।
इसी साल 7 बीघा में लगे करीब डेढ़ लाख अफीम के पौधों को सीज किया। जानकारों की मानें तो पुलिस और विभिन्न संगठनों द्वारा साल भर की जाने वाली कार्रवाई कुल नशे के कारोबार के दस फीसदी तक को ही ट्रेस कर पाती है। बाकी नब्बे फीसदी विभिन्न माध्यमों और विभिन्न रूपों में मार्केट में पहुंच जाता है।
कुल्लू और मंडी है खेती के गढ़
कुल्लू घाटी में वर्ष 2014 की तुलना में 2015 में 400 बीघा से अधिक क्षेत्र में भांग की खेती की गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस, वन विभाग और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने इस दौरान 1603 के मुकाबले 2003 बीघा क्षेत्र से भांग उखाड़ी।
लेकिन संयुक्त प्रयासों के बावजूद इसकी खेती पर रोक नहीं लग पा रही है। कुल्लू जिले में जनवरी से अब तक 46 किलो 643 ग्राम चरस पुलिस के हाथ लगी है। लंबे समय बाद मलाणा क्रीम पुलिस के हत्थे चढ़ी है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि घाटी के लोग फिर नशा उगाने की ओर मुड़ रहे हैं।
यही नहीं, वर्ष 2014 के मुकाबले 2015-16 में चरस भी अधिक मात्रा में पकड़ी गई है। कुल्लू में 2014 में 88 किलो 984 ग्राम, जबकि 2015 और जनवरी 2016 तक 135 किलो 637 ग्राम चरस पुलिस के हत्थे चढ़ी है।