कैग रिपोर्ट में खुलासा: ई-टेंडरिंग से जीएसटी तक सिस्टम में छेद, सरकारी उपक्रमों पर बढ़ा घाटे का बोझ
सरकारी खरीद, जीएसटी और सरकारी कंपनियों के कामकाज में कई बड़ी खामियां सामने आई हैं। मार्च 2023 को खत्म अवधि के लिए भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।
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हिमाचल प्रदेश में सरकारी खरीद, जीएसटी और सरकारी कंपनियों के कामकाज में कई बड़ी खामियां सामने आई हैं। मार्च 2023 को खत्म अवधि के लिए भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में ई-प्रोक्योरमेंट, ई-वे बिल, जीएसटी रिटर्न की जांच और सरकारी कंपनियों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा की गई है। सरकार ने वर्ष 2011 में ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम शुरू किया था। इसका मकसद सरकारी खरीद में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाना था। इसके बावजूद सितंबर 2024 तक तीन मॉड्यूल शुरू नहीं हो पाए। इनमें मांग प्रबंधन, कैटलॉग प्रबंधन और संविदा प्रबंधन शामिल हैं। विक्रेता प्रबंधन, ई-ऑक्शन और ई-पेमेंट भी पूरी तरह लागू नहीं हुए। कैग ने अप्रैल 2018 से मार्च 2023 तक 83 खरीद संस्थाओं की 77,152 निविदाओं का डाटा जांचा। इसमें 16 खरीद इकाइयों ने पोर्टल का इस्तेमाल ही नहीं किया। 15 इकाइयों ने पांच साल में 10 से भी कम निविदाएं पोर्टल पर डालीं। 50 करदाताओं की विस्तृत जांच में 29 ने जरूरी दस्तावेज नहीं दिए। 21 मामलों में दस्तावेज अधूरे मिले। जांच में 19 ऐसी कमियां मिलीं, जिनका कुल राजस्व प्रभाव 2,690.28 करोड़ था। इनमें गलत तरीके से आईटीसी लेना, कारोबार छिपाना और रिवर्स चार्ज के तहत गलत टैक्स देना शामिल था।
एक ही आईपी से बोलियां, मिलीभगत का शक
जांच में कुछ निविदाओं में ऐसे संकेत मिले, जिनसे बोली लगाने वालों के बीच मिलीभगत की आशंका पैदा हुई। कुछ मामलों में कम समय के अंतर पर एक ही या विभागीय आईपी पते से बोलियां डाली गईं। कुछ बोलियों में कीमत का अंतर भी बहुत कम था। निविदाओं को सीमा से बचने के लिए छोटे हिस्सों में बांटने के मामले भी मिले। कैग ने कहा कि पोर्टल में ऐसे संदिग्ध मामलों को पकड़ने और अधिकारियों को तुरंत सूचना देने की व्यवस्था नहीं थी। वर्ष 2020-21 में 256 मामलों में 49.56 करोड़ की वसूली के लिए डीआरसी-07 जारी किए गए। तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी 75 मामलों में केवल 2.09 करोड़ की वसूली हो सकी। कैग ने 627 बड़े डेटा अंतर पकड़े। इनमें से 207 मामलों में विभाग ने कोई जवाब नहीं दिया। इन मामलों में 569.67 करोड़ का जोखिम जुड़ा था।
जीएसटी में 121 करोड़ का कारोबार छिपाने का संकेत, 21.84 करोड़ की संभावित कर देनदारी
- वर्ष 2020-21 में 10 सर्कलों के 323 करदाताओं ने 569 रिटर्न में 2.43 करोड़ का टीडीएस दिखाया। इसके बावजूद जीएसटीआर-3बी में करयोग्य कारोबार शून्य बताया। कैग के अनुसार इससे 121.33 करोड़ का कारोबार छिपाए जाने का संकेत मिलता है। इस पर करीब 21.84 करोड़ की जीएसटी देनदारी बन सकती थी।
ई-वे बिल में खामियों से 14.43 करोड़ के राजस्व नुकसान का मामला
कैग की जांच में पता चला कि एक ही चालान से एक से ज्यादा ई-वे बिल बनाए जा सकते थे। कई मामलों में करदाताओं ने रिटर्न तो दाखिल किए, लेकिन पूरा टैक्स नहीं दिया। इससे सरकारी खजाने को 14.43 करोड़ का नुकसान हुआ। 45 करदाताओं के 120 ई-वे बिल की जांच में नौ करदाताओं ने 335.26 करोड़ का आईटीसी लिया, जबकि वे 314.92 करोड़ के ही हकदार थे। यानी 20.34 करोड़ का अतिरिक्त आईटीसी लिया गया।
14 उपक्रमों पर 4,985 करोड़ का संचित घाटा
प्रदेश के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की वित्तीय हालत भी कैग की रिपोर्ट ने खुलासा किया है। 31 मार्च 2023 तक प्रदेश में 30 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम थे। वर्ष 2022-23 में आठ उपक्रम घाटे में रहे और उनका कुल घाटा बढ़कर 604.94 करोड़ हो गया। इससे पिछले साल 12 उपक्रमों का कुल घाटा 498.55 करोड़ था। 31 मार्च 2023 तक 14 उपक्रमों पर 4,985.18 करोड़ की संचित घाटा रहा। इनमें नौ उपक्रमों की नेटवर्थ पूरी तरह खत्म होकर ऋणात्मक हो चुकी थी। रिपोर्ट के अनुसार 2022-23 में 13 सार्वजनिक उपक्रमों ने लाभ कमाया, लेकिन कुल लाभ घटकर 20.21 करोड़ रह गया। इनमें केवल हिमाचल प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड ने 0.36 करोड़ का लाभांश घोषित किया। आठ उपक्रमों ने 14.88 करोड़ का सकल लाभ कमाने के बावजूद लाभांश घोषित या अदा नहीं किया।
उपक्रमों के कामकाज में देरी भी सामने आई। 30 सितंबर 2023 तक 27 सरकारी कंपनियों के 73 खाते लंबित थे। खास बात यह रही कि इनमें से किसी भी कंपनी ने वर्ष 2022-23 के खाते कैग की लेखा परीक्षा के लिए प्रस्तुत नहीं किए थे। दो सांविधिक निगमों के भी दो खाते लंबित थे। कैग ने सरकारी कंपनियों में नियमों के पालन की स्थिति भी जांची। आठ उपक्रमों को स्वतंत्र निदेशक नियुक्त करने थे, लेकिन केवल तीन ने जरूरी संख्या में नियुक्तियां कीं। सात उपक्रमों को ऑडिट कमेटी बनानी थी, लेकिन केवल तीन ने इसका गठन किया। सात उपक्रमों को नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति बनानी थी, लेकिन केवल एक उपक्रम ने यह समिति बनाई। वहीं 25 उपक्रमों में से केवल चार ने कंपनी अधिनियम के तहत व्हिसल ब्लोअर व्यवस्था बनाई। कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के मामले में पांचों संबंधित उपक्रमों ने समिति बनाई और नीति तैयार की, लेकिन हिमाचल प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड की नीति में निगरानी व्यवस्था स्पष्ट नहीं थी। तीन उपक्रमों ने अपनी वेबसाइट पर सीएसआर नीति, समिति की संरचना और मंजूर परियोजनाओं की जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की।