दीप्ति ने मीडिया से साझा किए जज्बात, कहा- इस चीज से लगता था डर
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आर्ट मूवी की परिभाषा बदल चुकी है। पहले फिल्मों में सब्जेक्ट को तवज्जो दी जाती थी अब टेक्नीक को अहम माना जाता है। 80 के दशक के मुकाबले बहुत कुछ खोया है लेकिन पाया भी बहुत कुछ है। यह बात शनिवार को जानी मानी बालीबुड अभिनेत्री दीप्ति नवल ने शिमला में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कही।
वह गेयटी थियेटर में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि शिमला पहुंची थीं। दीप्ति ने कहा कि ‘हम टेक्नीक में कमजोर थे, लेकिन आज टेक्नीक में विश्व के बड़े बड़े देशों को टक्कर दे रहे हैं। पहले फिटनेस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था, लेकिन अब फिटनेस को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
आज के एक्टर बहुत अच्छे डांसर हैं पहले ऐसा नहीं था। दीप्ति ने बताया कि आर्ट मूवी की परिभाषा बदल गई है। अहम मुद्दों पर अभी भी फिल्में बन रही हैं। टॉयलेट, एक प्रेम कथा, पिकू और बर्फी महत्वपूर्ण विषयों पर बनी फिल्में हैं। आर्ट को आज कमर्शियल वे में प्रस्तुत किया जा रहा है।
‘दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश’ को नहीं मिले प्रोमोटर
दीप्ति ने बताया कि कमला, मैं जिंदा हूं, अनकही, चश्मेबद्दूर और मिर्च मसाला उनकी बेस्ट फिल्में हैं। आर्ट फिल्में अब सिर्फ फिल्म फेस्टिवल में ही दिखती हैं।
कुछ ऐसी फिल्में हैं जिन्हें पहचान नहीं मिल पाई ऐसी फिल्मों को यू ट्यूब पर डालने की योजना है, ताकि लोग इन्हें देख सकें। दीप्ति तीन किताबें भी लिख चुकी हैं।
लम्हा-लम्हा, ब्लैक विंड, दैन एंड नाऊ इनमें प्रमुख हैं। उन्होंने बताया कि मनाली में मेरा आर्ट वर्क संजोया गया है। मेरी पेंटिंग, फिल्म पोस्टर और किताबों को वॉकिंग गेलरी में संजोया गया है।
दीप्ति नवल ने कहा कि ‘दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश’ उनकी एक एक्सपेरिमेंट फिल्म थी। जिसकी कहानी मानवीय संबंधों के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म के लिए गुलजार साहब ने टाइटल सॉन्ग भी लिखा था।
लेकिन फिल्म को प्रोमोटर नहीं मिले। उन्होंने कहा कि मेरा बेस्ट काम थियेटर तक पहुंचा ही नहीं सका। दीप्ति ने बताया कि उन्होंने ‘थोड़ा सा आसमां’ टीवी सीरियल का निर्देशन भी किया।
पहले थियेटर से डर लगता था, कहीं लाइन भूल गई तो क्या होगा
दीप्ति नवल ने बताया कि मुझे पहले थियेटर से डर लगता था, डर सताता था कि कहीं कोई लाइन भूल गई तो क्या होगा, लेकिन अब शेखर सुमन के साथ मशहूर प्ले ‘एक मुलाकात’ के 60 से ज्यादा शो कर चुकी हूं।
शिमला में भी यह प्ले करने की योजना थी लेकिन पता नहीं क्यों फाइनल नहीं हो पाया। उन्होंने बताया कि मशहूर कलाकार मनोहर सिंह के साथ उन्होंने ‘दामुल’ फिल्म में एक सीन किया था।
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‘‘जब कुछ कहने का जी चाहता है ना
तब कुछ भी कहने को जी नहीं चाहता ’’