कैग को गंभीरता से लेते तो नहीं होता छात्रवृत्ति घोटाला
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शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने अगर नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के आडिट पैरा पर गंभीरता से गौर किया होता तो 250 करोड़ का छात्रवृत्ति घोटाला नहीं होना था। साल 2014-15 में कैग ने दस करोड़ के छात्रवृत्ति आवंटन पर सवाल उठाए थे।
कैग की इन आपत्तियों को उच्च अधिकारियों के ध्यान में नहीं लाया गया। इन आडिट पैरा को निचले स्तर पर ही बिना ठोस कार्रवाई के हटा दिया गया। वरिष्ठ अफसरों को बाईपास कर करोड़ों का घपला जारी रखा।
इस मामले के उजागर होने से शिक्षा निदेशालय के अफसरों की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में आ गई है। सीबीआई को भेजी गई जांच रिपोर्ट में इसका उल्लेख भी किया गया है।
कैग रिपोर्ट में यूजीसी से मान्यता न लेने वाले संस्थानों को भी करीब दस करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति जारी होने की बात कही गई थी।इस अनियमितता को लेकर कैग रिपोर्ट ने साल 2014-15 में विशेष टिप्पणियां की थीं। लेकिन तत्कालीन अधिकारियों ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया।
सीटें थीं 800, निजी संस्थान ने कर दी 3300 एडमिशन
विभागीय अधिकारियों की लापरवाही से घोटाला करने वालों के हौसले बुलंद होते रहे और छात्रवृत्ति घोटाला 250 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। प्रदेश में इस साल सत्ता परिवर्तन के बाद जनजातीय क्षेत्रों में छात्रवृत्ति न मिलने के मामले सामने आने के बाद हुई जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए।
इसके चलते मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को मामले की जांच सीबीआई से करवाने की सिफारिश करनी पड़ी। छात्रवृत्ति घोटाले को लेकर तैयार की गई शिक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि एक निजी शिक्षण
संस्थान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के लिए 800 सीटें थी जबकि एडमिशन 3300 विद्यार्थियों को दे दी गई। शिक्षा निदेशालय ने भी इस मामले की जांच किए बिना 3300 विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति राशि जारी कर दी।