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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Shimla News ›   Atal Tunnel rohtang: Atal Bihari Vajpayee and Tashi Dawa friendship played an important role in Rohtang tunnel construction

रोहतांग टनल निर्माण में अटल-टशी की दोस्ती ने निभाया अहम किरदार, पढ़ें पूरा मामला

Wed, 30 Sep 2020 03:02 AM IST
Krishan Singh अशोक राणा, अमर उजाला, केलांग (लाहौल-स्पीति)
अशोक राणा, अमर उजाला, केलांग (लाहौल-स्पीति) Published by: Krishan Singh Updated Wed, 30 Sep 2020 03:02 AM IST
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Atal Tunnel rohtang: Atal Bihari Vajpayee and Tashi Dawa friendship played an important role in Rohtang tunnel construction
पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और टशी दावा - फोटो : अमर उजाला

भले ही अटल टनल रोहतांग के निर्माण में हर नेता और पार्टी ने अपनी भूमिका निभाई है, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और टशी दावा की दोस्ती इस दिशा में अहम कड़ी बनी। वर्ष 1942 में आरएसएस के तृतीय वर्ष कोर्स में नागपुर में दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी। जब अटल देश के प्रधानमंत्री बने तब संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी चमन लाल ने सालों बाद दोनों की मुलाकात करवाई। फिर टनल निर्माण को लेकर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। टशी दावा उर्फ अर्जुन गोपाल के निमंत्रण पर ही वाजपेयी 2 जून 2000 को केलांग पहुंचे। यहां पर वाजपेयी ने रोहतांग सुरंग निर्माण की विधिवत घोषणा की। सुरंग निर्माण की मांग को लेकर टशी दावा अपने दो मित्रों छेरिंग दोरजे और अभय चंद राणा ने कई बार दिल्ली जाकर वाजपेयी से मुलाकात की।

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भले ही रोहतांग टनल निर्माण की सुगबुगाहट दशकों पूर्व से चल रही थी लेकिन पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने मित्र टशी दावा के कहने के बाद घोषणा की और 2002 में मनाली के बाहंग से वाजपेयी ने पलचान से साउथ पोर्टल सड़क मार्ग का शिलान्यास किया। वर्ष 2000 में टनल परियोजना की अनुमानित लागत 500 करोड़ रुपये आंकी गई थी और 2007 में स्नोवी माउंटेन इंजीनियरिंग कारपोरेशन को निर्माण का ठेका दिया गया। घोषणाओं के बावजूद 2009 तक कार्य में कोई प्रगति नहीं हुई। फिर एफकॉन व स्ट्रॉबेग को काम सौंपा गया। उसी साल कैबिनेट ऑन सिक्योरिटी ने रोहतांग टनल निर्माण को हरी झंडी दी। 28 जून 2010 को सोनिया गांधी के टनल शिलान्यास के बाद खुदाई का काम शुरू हुआ। 
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सबसे पहले मोरोवियन मिशनरीज ने की थी सुरंग की कल्पना
दुनिया में सबसे ऊंचाई पर बनी सबसे लंबी अटल टनल रोहतांग ने करीब 160 साल का लंबा सफर तय किया है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान साल 1860 में सबसे पहले मोरोवियन मिशनरीज ने रोहतांग दर्रा के नीचे सुरंग बनाने की कल्पना की थी। हालांकि उनकी यह कल्पना महज कल्पना ही बनकर रह गई लेकिन अंग्रेजों की इस सोच ने भविष्य में इस ऐतिहासिक टनल की नींव रखने में अहम किरदार निभाया। आजादी के बाद 1953 में टनल को खारिज कर राहलाफाल से रोहतांग और कोकसर तक रोपवे बनाने की योजना भी बनी थी। 

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