पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले में आखिर कहां हुई चूक
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अब नामुराद आतंकी संगठन जैश ए मुहम्मद मजाक उड़ाते हुए कह रहा है कि हिंदुस्तानी फौज छह फिदाइनों को काबू में नहीं कर सकी। यह पहला अवसर है जब उन्हें हमारी सेना का मनोबल तोड़ने का मौका मिल गया। ये ठीक है कि हमने एयरफोर्स एयरबेस में ज्यादा नुकसान नहीं होने दिया लेकिन इस हमले में हमने अपने सात बेशकीमती जांबाज जवान खो दिए। हिमाचल से केरल तक देशवासियों ने अपने अश्कों पर इन शहीदों का जनाजा उठाया।
और सबसे चिंताजनक तथ्य यह रहा कि छह आतंकवादियों को काबू करने में हमने पूरे चार दिन लिगा दिए और एक को भी हम जिंदा नहीं पकड़ सके। वह भी तब जबकि देश के इस सबसे सुरक्षित सैन्य स्टेशन में ये आतंकवादी चूहे की तरह फंस गए थे और सारे अत्याधुनिक हथियारों से लैस हमारी दस हजार की फौज उन्हें चारों तरफ से घेरे हुई थी। एयरबेस पर हमला होने के पुख्ता इंटेलीजेंस इनपुट हमारे पास थे।
आतंकी हमलों से निपटने के लिए खास तौर से प्रशिक्षित नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) के करीब 150 कमांडो का जत्था एक विशेष विमान से एक दिन पहले ही पठानकोट पहुंच गया। हमला अगले दिन तड़के शुरू हुआ। इन शहीदों पर पूरे देश को नाज है। हमारी फौज की बहादुरी और काबिलियत पर कोई संदेह नहीं कर सकता। हमने देखा है, वह एक इशारे पर अपनी मातृभूमि पर जान न्यौछावर करने को हमेशा तत्पर रहते हैं। फौजियों को वही करना होता है जो ऊपर से उन्हें करने को आदेश मिलते हैं।
पूरा ऑपरेशन सवालों के घेरे में
फिर चूक कहां हुई कि पूरा ऑपरेशन सवालों के घेरे में आ गया। कारण इतने साफ हैं कि हम बिंदुवार इन चूकों को गिन सकते हैं। ये आतंकी भारत-पाक सीमा की तरफ से पंजाब में घुसे। क्या हमारी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं इतनी असुरक्षित हैं कि आतंकवादियों की एक पूरी हथियारबंद टोली हमारे देश में इतनी आसानी से दाखिल हो सकती है? आतंकवादी 31 दिसंबर की रात गुरदासपुर के एक पुलिस अधीक्षक सलविंदर सिंह तलूर का न सिर्फ अपहरण कर लेते हैं बल्कि उनकी कार से एयरफोर्स बेस तक पहुंच जाते हैं।
इस कार को किसी नाके पर सिर्फ इसलिए नहीं रोका जाता क्योंकि उस पर नीली बत्ती लगी है। आतंकी एयरफोर्स स्टेशन की पिछली दीवार के नीचे एक सीवरेज निकासी गटर से एयरफोर्स बेस में दाखिल हुए। आप सोचिए 1965 और 1971 के युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाले एयरबेस का सुरक्षा घेरा इतना कमजोर था कि कोई भी रात के अंधेरे में उसे आसानी से भेद दे? एयरफोर्स स्टेशन में फायरिंग शुरू हुई तब सुरक्षा एजेंसियों को पता चला कि आतंकवादी परिसर में दाखिल हो चुके हैं। एसपी सलविंदर सिंह तलूर की गाड़ी छीनने और फायरिंग शुरू होने के बीच तकरीबन चौबीस घंटे का अंतर था।
इन 24 घंटे में हम इनकी सही लोकेशन तक ट्रेस नहीं कर पाए? हम वक्त पर ये पता नहीं लगा पाए कि आतंकी दो गुटों में अंदर दाखिल हुए। आतंकवादियों ने जब एसपी के फोन से पाकिस्तान बात की तो उन्हें पाकिस्तान में बैठे आकाओं ने लताड़ लगाई कि दो लोग एयरबेस में पहले ही घुस चुके हैं तुम अभी तक क्यों नहीं अंदर गए? यह सूचना अंदर देर से पहुंची। चार आतंकियों को मारने के बाद रात में ऑपरेशन रोक दिया गया? अंधेरे का फायदा उठाकर दो आतंकी सेना की रसोई तक पहुंच गए और रात भर उन्हें आराम करने का मौका मिल गया।
हिमाचल का वीर निहत्था ही इन आतंकियों पर टूट पड़ा
हमारे हिमाचल का एक वीर निहत्था इन आतंकियों पर टूट पड़ा। उसने उन्हीं की गन से एक को मौत के घाट उतार दिया। बाद में पीछे से हमला कर आतंकी के साथी ने उस जवान को शहीद कर दिया। अंदर यह सब चल रहा था, उधर 3 जनवरी तक हमारी एजेंसियों को बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस में कहना पड़ा कि उन्हें अब तक नहीं पता कि अंदर कितने आतंकवादी छुपे हैं? ऐसे आतंकी हमलों में सुरक्षा एजेंसियों की पहली कोशिश होती है कि वह इन्हें जिंदा काबू में लें। तमाम गोपनीय जानकारियां मिलने के अलावा इसके कई कूटनीतिक फायदे हैं जिसके दूरगामी नतीजे सामने आते हैं।
तब सबूतों के लिए हमें पाकिस्तानी ब्रांड के जूतों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। जैसा कि अब पाक कह रहा है कि सबूत पर्याप्त नहीं हैं। तब वे सब हमारे शिकंजे में थे। हमले की पूर्व सूचना होने के कारण एयरफोर्स बेस से हम अपने एयरक्राफ्ट, कीमती मिसाइलें और दूसरे अहम सामरिक साजो सामान हटा चुके थे। लेकिन फिर भी हम उनमें से किसी एक को भी जीवित नहीं पकड़ पाए। जबकि ऐसे संवेदनशील ऑपरेशन से निपटने के लिए आज दुनिया में हर तरह के अत्याधुनिक साजो सामान और तरीके मौजूद हैं। सुरक्षा एजेंसियों का ये तर्क ठीक है कि ऐसे ऑपरेशन में काबिंग में वक्त लगता है जबकि ऑपरेशन रिहाइशी इलाके में चल रहा हो।
लेकिन क्या एनएसएजी ऐसा तर्क देकर बच सकता है जबकि उन्हें ऐसे ही आतंकी हमले से निपटने की ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वे कम वक्त में न्यूनतम नुकसान के ऐसी मुसीबत से छुटकारा दिलाए। एक आतंकी की लाश हटाने में हमने एनएसएजी का एक नौजवान लेफ्टिनेंट कर्नल खोया। बम डिस्पोजल दस्ते का ये जांबाज एक्सपर्ट लेफ्टिनेंट कर्नल आतंकी के शरीर से विस्फोटक डिफ्यूज करने के लिए उसके करीब गए थे और लाश को छूते ही धमाका हुआ जिसमें वह शहीद हो गए। इस धमाके में पांच अन्य जवान घायल हुए। यह बेहद चिंताजनक है क्योंकि विस्फोटक डिफ्यूज करने की पहली शर्त है कि ऐसी लाश से सारे जवान कम से कम 75 मीटर दूर रहें।
अमेरिका और इजराइल की तरह हमने क्यों नहीं किया
ऐसे फिदाइन की लाश के करीब सिर्फ बम निरोधक दस्ता जाता है वह भी बॉडी सूट से लैस होकर। अमेरिका और इजराइल जैसे देश तो विस्फोटक की आशंका होने पर उसकी मारक क्षमता जानने के लिए पहले छोटी रोबोट मशीनें भेजते हैं। क्या हमने इन रोबोट मशीनों का इस्तेमाल किया? अगर हां तो एक मौत कैसे हुई और हमारे पांच जवान गंभीर रूप से घायल कैसे हुए? क्या सबने बम निरोधक बॉडी सूट पहने हुए थे?
ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब सामने आने चाहिए ताकि हम इस तरह के हमलों से निपटने के लिए फूलप्रूफ रणनीति तैयार कर सकें। सच ये है कि आतंकी हमलों के बहाने पाकिस्तान हमारे साथ छद्म युद्ध लड़ रहा है। उनकी शैली गुरिल्ला युद्ध की है। पारंपरिक युद्ध आमने-सामने होते हैं जिसमें भारतीय सेना का कोई जवाब नहीं। लेकिन गुरिल्ला युद्ध में दुश्मन के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता। एक जिंदगी होती है जिसे वह अपने नापाक मंसूबों के नाम पहले ही फिदा कर चुके होते हैं।
ये ज्यादा खतरनाक है। वियतनाम ने इसी युद्ध शैली से अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को तकरीबन आठ साल छकाया। अलकायदा इसी युद्ध शैली के जरिए पूरे विश्व में आतंक का दूसरा नाम बन गया। तो अब हमें इस छद्म युद्ध से मुकाबले के लिए तैयार रहना होगा। इजराइली कमांडो इस शैली का जवाब देने में माहिर हैं।
चालीस साल पहले इजराइली कमांडोज ने दिखाई थी ऐसी बहादुरी
चालीस साल पहले इजराइली कमांडोज ने युगांडा हवाई अड्डे पर जिस तरह अपने नागरिकों को आतंकियों के चंगुल से बिना नुकसान के आजाद कराया वह आज भी अपने में एक मिसाल है। एयरपोर्ट के एक पुराने टर्मिनल से इन इजराइली जांबाजों ने केवल 53 मिनट की मुठभेड़ में 105 यात्रियों को सुरक्षित निकाल लिया।
इस पूरे ऑपरेशन में केवल 3 नागरिकों और एक लेफ्टिनेंट की जान गई थी। भारत एक बेहद भावुक देश है और आम तौर पर हम अपनी सैन्य नाकामियों पर चर्चा नहीं करते। लेकिन पठानकोट का यह संयुक्त सैन्य ऑपरेशन एक सबक है। विशेषज्ञ यहां तक कह रहे हैं कि यह ऑपरेशन अगर सिर्फ सेना के हवाले होता तो सिर्फ 5 घंटे में निपट गया होता।
अब तो खुद रक्षा मंत्री मान रहे हैं कि चूक हुई। बजाए इस सच से पलायन करने के हमारी सरकार को आत्म चिंतन की जरूरत है। जरूरत है हम अपने एनएसजी व सेना के कमांडो को ऐसे हमलों से निपटने के लिए और अत्याधुनिक ट्रेनिंग दें। हर छोटी-सी नाकामी भी हमें सीखने का एक मौका देती है। यह अटूट सत्य है अगर आपकी सोच सकारात्मक हो तो। अपने सुझाव और प्रतिक्रिया के लिए 9736023310 व्हाट्स एप पर संदेश भेजें