भ्रष्टाचार के इन बगीचों के सेब आखिर कब तक खाएंगे नेताजी!
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जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है। इस नारे के साथ उन्होंने जंगल के जंगल साफ कर दिए। सैकड़ों बीघे जमीन पर इन रसूखदारों ने सेब के बगीचे लगा लिए। और शुरू हुआ भ्रष्टाचार के बगीचों के लाल सेब का काला कारोबार। वन विभाग की जमीन पर अवैध कब्जा कर इन रसूखदारों ने इस सेब के असल बागवानों का बाजार बिगाड़ दिया। छुटभईए नेताओं के लिए ये रसूखदार प्रेरणा बन गए।
नेताओं ने अपने रिश्तेदारों के नाम पर बड़े कब्जे किए और उनके चेले-चपाटों ने छोटे कब्जे। पिछले कोई तीन दशकों से यह कारोबार खुलेआम चल रहा है। जंगल की जमीन से हर साल करोड़ों की कमाई हो रही है। सरकार हैरतनाक ढंग से चुप है। पुलिस प्रशासन खामोश है। वन विभाग और राजस्व के अफसर मलाई खा रहे हैं। यहां कानून नहीं, सिर्फ जंगल राज चलता है।
हाईकोर्ट के ताजा आदेश ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र के मंदिर में देर है अंधेर नहीं। हाईकोर्ट ने सरकार को तीन महीने का वक्त दिया है और कहा है कि रसूखदारों के कब्जे हटाओ। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करो। इस फैसले से आम जनता खुश है। सोशल मीडिया फैसले का स्वागत कर रहा है। लेकिन राजनीतिक दलों के नेता परेशान हैं। वे कह रहे हैं- सरकार ने केस ठीक से नहीं लड़ा। और केस क्या है? जंगल की जमीन पर अवैध कब्जे का। कितनी अजीब बात है।
आप अपराध करते हैं। फिर उसको जस्टीफाई करते हैं। बिना किसी तर्क के। जंगल की जमीन सरकारी है। इस पर कब्जा करना पूरे देश में वन संरक्षण एक्ट 1980 के तहत एक गंभीर अपराध है। क्योंकि जंगल को नुकसान पहुंचाने का मतलब है पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना। और पर्यावरण का सवाल न सिर्फ हिमाचल बल्कि देश के हर खासो आम जनता की जिंदगी से जुड़ा है।
जंगल पर आखिर किस तरह हुए ये कब्जे
लेकिन वे चीखकर कहते हैं- पर्यावरण का क्या सारा ठेका हिमाचल ने ले रखा है? आप देखिए इन रसूखदारों का असर। सेब के अवैध बगीचे हटाने के आदेश छह महीने पहले हुए थे। सेब से लकदक पेड़ काटे जाने लगे। हल्ला मचा। प्रदर्शन हुए। आदेश थे, पेड़ कटे। इसी बीच इन कब्जाधारियों ने पेड़ों से सेब तोड़ना शुरू कर दिया। वक्त से पहले ही सेब बेच दिए। उसका आकार छोटा था। अचानक बाजार में इतने सेब आ गए कि बीते साल सेब के रेट गिर गए।
पिछले सीजन में साढ़े 3 करोड़ से ज्यादा सेब की पेटियां बिकीं। ये रिकॉर्ड बिक्री थी। लेकिन पेड़ों पर आरी छोटे कब्जाधारकों पर चली। गरीब बागवानों पर चली। जिनसे कोई नहीं डरता क्योंकि वह किसी का तबादला नहीं करा सकते। राजनेताओं और खासकर मंत्रियों, पूर्व मंत्रियों के रिश्तेदारों के अवैध बागानों का बाल भी बांका नहीं हुआ। वन विभाग के कर्मचारियों की हिम्मत नहीं थी कि वे उस आरी को लेकर जंगल में घुस सकें, जिसके वे रखवाले हैं। जंगल पर ये कब्जा रातोंरात नहीं हुआ।
डॉ. परमार साहब के बाद जैसे-जैसे हिमाचली राजनीति का पतन हुआ, जंगल पर अतिक्रमण बढ़ता गया। सन 2000 में तो एक सरकार ने आदेश जारी कर दिए कि अगर आपने कब्जा किया है तो दावा कीजिए, एफिडेविट दीजिए, हम उसे रेगुलराइज कर देंगे। उस वक्त जिन लोगों ने अवैध कब्जे नहीं किए थे, वे भी जंगल की जमीन पर कब्जे करने लगे। अब आप बताइए, ऐसा दुनिया में कहीं होता है।
ऐसा केवल जंगलराज में ही हो सकता है। जब भाजपा की सरकार आई तो उनके नेताओं ने जंगल कब्जाए फिर कांग्रेस की आई तो उनके नेताओं ने कब्जे शुरू कर दिए। दोनों के बीच एक मौन अनुबंध हो गया कि इस मसले पर न तुम हमें छेड़ो, न हम तुम्हें छेड़ेंगे। वन पर अवैध कब्जे का यह कभी न टूटने वाला गठबंधन रंग लाया। जंगल कम होते गए और सेब के बगीचे बढ़ते गए।
1950 में सिर्फ 500 हेक्टेयर और अब एक लाख हेक्टेयर में हो रही सेब की खेती
हिमाचल में सेब 19वीं सदी के मध्य में शुरू हुआ। सेब की खेती के लिए उन्नत किस्में 1918 में स्टोक्स साहेब लाए थे। लेकिन सेब का कारोबार यहां पिछले तीन-चार दशक में एकदम से परवान चढ़ा, जिसका एक बड़ा कारण वन पर अतिक्रमण था। जंगल कटते गए और सेब का कारोबार बढ़ता गया। आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। 50 के दशक में हिमाचल में सिर्फ 500 हेक्टेयर भूमि पर सेब उत्पादन होता था।
2000 में यह एकदम से बढ़कर करीब 86,000 हेक्टेयर हो गया। आज ये एक लाख हेक्टेयर से ऊपर है। आप कह सकते हैं, बागवान जागरूक हो गए। लेकिन सेब के बाग लगाने के लिए इतनी जमीन कहां से आई यह एक अलग जांच का विषय है। अब अदालत के शिकंजे में फंसे रसूखदार गरीब और सीमांत किसानों का नाम लेकर एकजुट होकर अपने धंधे को बचाने में जुट गए हैं।
कोई इनसे पूछे- किस गरीब आदमी में यह हिम्मत है कि वह जंगल की सरकारी जमीन पर कब्जा कर ले। गुजर-बसर के लिए किसी ने एक दो बीघा जमीन आगे बढ़ा ली। असल दोषी 40-50 बीघा जमीन के मालिक हैं, जिन्होंने जंगल के अंदर तक जाकर 100 बीघे तक कब्जा कर लिया। इसीलिए वे सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि वह इन अवैध कब्जों को नियमित करने के लिए कोई नीति बनाए। कानून बनाए। हाईकोर्ट उस कानून को चेंज थोडे़ कर लेगा।
और अब दोनों सियासी दल एकजुट होकर मुद्दा बंद करने की तैयारी में
सभी दल एकजुट होकर मेज थपथपा कर इसका समर्थन करेंगे। यानी, उनका इरादा इस अपराध का विनियमितीकरण कर इसे संरक्षण देने का है। ये जानते हुए कि ये भारत सरकार का कानून है और किसी भी राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं कि वह इसके लिए कोई नीति बनाकर जंगल में अतिक्रमण को वैधानिक बना दे। अदालत ये हथकंडे जानती है इसलिए उसने इस तरह की कोई भी नीति बनाने पर रोक लगा दी है।
तो आप देखिए कितने संस्थागत ढंग से डंके की चोट पर सीनाजोरी हो रही है। ऐसे में राजनेताओं से कोई उम्मीद शेष नहीं रहती। कोर्ट ने अफसरों को एक मौका दिया है पश्चाताप का। अब वक्त है कि वे अभियान चलाकर भ्रष्टाचार की इस फसल को हमेशा के लिए नष्ट कर दें। वहां नए छायादार पेड़ लगाए। अतिक्रमणकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें सलाखों के पीछे भेजें।
कोर्ट ने इस कार्रवाई के विरोध में धरना-प्रदर्शन पर पहले ही रोक लगा दी है। जो प्रदर्शन करेगा, उस पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलेगा। तो इससे अच्छा मौका और कोई नहीं हो सकता। ये उस प्रतिज्ञा को पूरा करने का वक्त है जो आपने नौकरी शुरू करने के पहले दिन ली थी। हिमाचल की आने वाली पीढ़ियां आपको याद रखेंगी।