जरूरत है हिमाचल में अब अफसरशाही के स्क्रू कसने की
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कुल्लू के कोटला में जो हुआ वह सच में शर्मनाक है। पूरा गांव जल कर राख हो गया और मौके पर फायर ब्रिगेड नहीं पहुंच सकी। वजह सिर्फ इतनी थी कि रास्ता खराब था। संपर्क मार्ग पर मलबा गिरा हुआ था और कहीं-कहीं संकरा था जिसे जेसीबी से तत्काल हटाया जा सकता था, पर नहीं हटाया गया और गांव से करीब दो किलोमीटर दूर दमकल वाहन रोककर फायरमैन पैदल मौके पर पहुंचे और गांव वालों से मिलकर परंपरागत तरीके से आग पर काबू पाने का प्रयास किया।
80 घर और 5 मंदिर जल गए। हालांकि, किसी तरह आठ घरों को जलने से बचा लिया गया। संकरे पहाड़ी रास्तों पर हम मान सकते हैं कि हर जगह अग्निशमन वाहन न पहुंचते हों, लेकिन कोटला में ऐसा नहीं था। पंचायत ने वर्ष 2000 में एक कच्ची सड़क बनाई थी।
गांव वाले लोक निर्माण विभाग से कहते रहे कि इस लिंक रोड की जिम्मेदारी ले लीजिए और गांव के लिए पक्की सड़क बना दीजिए, पर 15 साल में सड़क नहीं बनी। मुख्यमंत्री को जले पर मरहम लगाने के लिए कोटला आना था सो लोनिवि ने चौबीस घंटे में जेसीबी लगाकर कार जाने योग्य रास्ता बना दिया। ये रास्ता अगर अग्निकांड की रात ही साफ हो गया होता तो कई घर तबाह होने से बच जाते।
अफसरों के ये हैं हाल
यह कहानी बताती है कि हिमाचल प्रदेश में अफसरशाही किस तरह काम कर रही है और वह आम जनता की चिंताओं और मुश्किलों के प्रति कितनी असंवेदनशील है। प्रदेश में ऐसे न जाने कितने गांव हैं जहां लिंक रोड नहीं हैं। लिंक रोड के हजारों प्रस्ताव फाइलों में दबे पड़े हैं। अकेले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत करीब 700 लिंक रोड फॉरेस्ट क्लीयरेंस, गिफ्ट डीड आदि के फेर में फंसे हैं।
शिमला और दूसरे शहरों में हाईवे चमचमा रहे हैं, लेकिन अंदर के रास्तों का बुरा हाल है। जिस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। ये घटना सिर्फ एक बानगी है। उस दिन राजभवन में अफसरों की मीटिंग में राज्यपाल ने एक अफसर से सूबे में नशे के कारोबार के बारे में जानना चाहा था। ड्रग्स के ये सबसे बड़े अफसर खुद बद्दी में बैठते हैं, उन्हें इसके बारे में कुछ पता नहीं था।
उनका पूरा ध्यान केवल दवा के कारोबार और उसे बनाने वाली कंपनियों पर रहता है। उन्होंने ही बताया कि नारकोटिक्स विभाग में कुल तीन अफसर हैं जिनके कंधे पर पूरे प्रदेश को नशा मुक्त करने की जिम्मेदारी है। जबकि हर जिले में एक नारकोटिक्स सेल होना चाहिए। आप कल्पना कर सकते हैं कि ये कितना खतरनाक तथ्य है।
नई उम्र की पौध नशाखोरी में तबाह
ई उम्र की पौध नशाखोरी में तबाह हो रही है और किसी को इसकी फिक्र नहीं है। एक आकलन के मुताबिक हिमाचल में हर साल करीब 100 टन चरस का अवैध उत्पादन हो रहा है। 30 टन अफीम हरियाणा, पंजाब से आ रही है। एक शोधकर्ता ने बताया कि कैंब्रिज यूनिवर्सिटी तक यहां के नशे की सप्लाई हो रही है। इसे देखने वाला कौन है? खुद गवर्नर को कहना पड़ा- ऐसे नहीं चलेगा श्रीमान जी! हमें पूरी गंभीरता और ईमानदारी से काम करना पड़ेगा। लचर अफसरशाही का एक और नमूना इसी मीटिंग में दिखा।
गवर्नर ने नगर निगम के एक बड़े अधिकारी से पूछा कि शिमला में कितने डस्टबिन हैं? अफसर ने कहा-100। सिर्फ सौ? गवर्नर ने तीन बार पूछा- जवाब वही मिला। अफसर अंत तक स्पष्ट नहीं कर सके कि वह कूड़ा जमा करने के डंपर की संख्या बता रहे हैं, साधारण डस्टबिन की नहीं। जबकि गवर्नर का आशय सड़क के किनारे लगे पब्लिक डस्टबिन से था। हिमाचल में बैड गवर्नेंस का सबसे खौफनाक नमूना उस वक्त सामने आया जब हाईकोर्ट को सेब से लदे हरे भरे पेड़ काटने के आदेश देने पड़े।
आप समझ सकते हैं कि पर्यावरण के प्रति अति संवेदनशील अदालत को यह फैसला दिल पर पत्थर रख कर लेना पड़ा होगा। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे भी नौकरशाही से उम्मीद नहीं कि वह बरसों से चल रहे इस अवैध कारोबार को बंद करवा सकती है। जंगल की जमीन पर सेब के अवैध पौधे लगाकर रसूखदार करोड़पति बन गए। ऐसा नहीं कि अफसर इस गोरखधंधे से अनभिज्ञ होंगे।
राजनीतिक खेमों में बंट गए हैं अफसर
तो ये अजीबोगरीब स्थिति है। दरअसल प्रदेश की अफसरशाही साफ तौर पर राजनीतिक खेमों में बंट गई है। एक भाजपा का खेमा है दूसरा कांग्रेस का। एक सरकार जाती है तो अफसर विरोधी सरकार के कोप से बचने के लिए केंद्र में डेपुटेशन पर चले जाते हैं। जो रह जाते हैं वे सिर्फ अंधेरे कमरों में वक्त काटते हैं।
तीसरे कुछ राजनीतिक रूप से तटस्थ अफसर हैं जिनके भरोसे राज्य चल रहा है। सरकार अपनी समस्याओं से जूझ रही है। उसका ज्यादा वक्त अदालतों में बीत रहा है। मंत्री सरकार बचाने में जुटे हैं। आरोप-प्रत्यारोप के मकड़जाल में फंसी राजनीति अपने मूल मकसद से भटक गई है।
नौकरशाही जिसका दायित्व है कि वह सरकार की लोकहितकारी नीतियां जनता तक पहुंचाए, वह इस काम के अलावा सारे काम कर रही है। किसी भी लोकप्रिय सरकार के लिए यह खतरनाक संकेत हैं। अब वक्त आ गया है कि नौकरशाही के स्क्रू कसे जाएं। वरना कोई हैरत की बात नहीं कि कुछ सालों में हिमाचल का हाल यूपी-बिहार जैसा हो जाए।