बागवानों ने लुटवा दिए लाखों रुपये, फेल हो गई ये तकनीक
विदेशों से आई सेब पौधों की टिशू कल्चर तकनीक हिमाचल में फेल हो गई है। कुछ साल बाद ही ये पौधे सूखने लगे हैं। कलम करने पर इन पौधों का वुड टू वुड मिलान नहीं हो रहा है। अब टिशू कल्चर की बनिस्बत क्लोनिंग की प्रक्रिया के बनाए गए पौधे ही बेहतर माने जाने लगे हैं। हैरत की बात यह है कि कई बागवानों ने टिशू कल्चर पौधों की खरीद में लाखों रुपये लुटवा दिए।
ऐसे बागवान अब पछताने लगे हैं। प्रदेश के बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के वैज्ञानिक भी इस तरह के पौधे उगाने के पक्ष में नहीं थे। उनकी सलाह के बगैर ही इन्हें बागवान खरीदते रहे और नर्सरी उत्पादक बेचते रहे। हिमाचल में कुछ प्रगतिशील बागवानों ने टिशू कल्चर पर आधारित नर्सरियां लगाईं, मगर इनमें उत्पादित पौधों को अब समेटने की बारी आ गई है।
ऐसी नर्सरियां बागवानी तकनीकी मिशन और राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की मदद से आर्थिक सहायता प्राप्त करने के बाद लगाई गईं। करीब सात-आठ साल पहले प्रदेश में स्थापित की गई ऐसी नर्सरियों से सेब पौधों की बहुत मांग रही मगर इनसे बागवानों ने जो पौधे खरीदे थे, वे अब सूखने लगे हैं या फिर उनमें ग्रोथ ही नहीं है। ऐसे सेब पौधों में फल भी बहुत कम लग रहे हैं।
कई बागवान तो इन पौधों को उखाड़ने लगे हैं। प्रदेश में एक बड़ी टिशू कल्चर नर्सरी को तो पूरी तरह से बदल दिया गया है। अब इसमें क्लोनिंग से ही सेब पौधे उगाए जा रहे हैं। प्रगतिशील बागवान सुरेश पांजटा ने कहा कि ये पौधे ग्राफ्टिंग यूनियन से ब्रेक हो रहे हैं। इसका स्किन से स्किन मिलान हो रहा है। वुड टू वुड मिलान नहीं हो रहा है। इस तकनीक पर बागवानों को नहीं जाना चाहिए। क्लोनल रूट स्टॉक ही लिए जाएं।
टेस्ट ट्यूब में केमिकल के बीच टिशू डालकर तैयार किए जाते हैं पौधे
इन सेब पौधों को टेस्ट ट्यूब में टिशू डालकर तैयार किया जाता है। उसके बाद इसमें केमिकल डाले जाते हैं।बाद में ये फ्लास्क में डाले जाते हैं। इन्हें 40 से 42 दिन की प्रक्रिया के बाद तैयार किया जाता है।
दो चरणों में पौधा लैब में रहता है। इसके बाद ग्लास हाउस और फील्ड में दो चरण में पौधे को बागवानों को देने लायक बनाया जाता है। प्रचार यह किया जाता रहा है कि ये पौधे रोगरोधी होते हैं और इनमें फल अच्छे उगते हैं।
विश्वविद्यालय से नहीं ली सलाह
डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के पूर्व कुलपति डॉ. विजय सिंह ठाकुर वर्तमान मेें इसी विश्वविद्यालय में निदेशक विस्तार हैं। उनका कहना है कि यह तकनीक महज प्रयोगों के लिए ठीक है।
बागीचा लगाने के लिए सही नहीं है। टिशू कल्चर से बनाए गए पौधे कचालू, केले, फूलों आदि के लिए ठीक हैं। दुनिया में कहीं भी चले जाएं, ऐसे पौधे कहीं भी बागीचों में नहीं हैं।
किसी ने इस तकनीक पर जाने से पहले बागवानी विश्वविद्यालय को नहीं पूछा। वरना यह नौबत नहीं आती।